मैं पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई । रूप-रासि गुन-सील सुहाई ॥
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई ॥
maiṃ puni putravadhū priya pāī | rūpa-rāsi guna-sīla suhāī ||
nayana putari kari prīti bar̤hāī | rākheum̐ prāna jānikihiṃ lāī ||
5 श्लोक · 59 में से 326
कौसल्या आगे कहती हैं, मैंने रूप, गुण और शील से सुहावनी प्रिय पुत्रवधू पाई। उसे आँखों की पुतली बनाकर प्रीति बढ़ाई और जानकी में अपने प्राण लगाए रखे। कल्पलता की तरह स्नेह के जल से उसे पाला; अब फूलते फलते समय विधाता उलटा हो गया। पलंग, पीढ़ा, गोद और झूले को छोड़ सीता ने कठोर धरती पर पैर नहीं रखा। मैं संजीवनी जड़ी की तरह उसकी रखवाली करती रही, दीपक की बत्ती सरकाने को भी नहीं कहा। वही सीता तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है, हे रघुनाथ, क्या आज्ञा है? चन्द्रमा की किरणों का रस लेने वाली चकोरी सूर्य की ओर आँख कैसे मिलाए? वन में हाथी, सिंह, राक्षस विचरते हैं। बेटा, क्या विष की वाटिका में सुन्दर संजीवनी बूटी शोभा पाती है?
मैं पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई । रूप-रासि गुन-सील सुहाई ॥
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई ॥
maiṃ puni putravadhū priya pāī | rūpa-rāsi guna-sīla suhāī ||
nayana putari kari prīti bar̤hāī | rākheum̐ prāna jānikihiṃ lāī ||
कलपबेलि जिमि बहु बिधि लाली । सींचि सनेह-सलिल प्रतिपाली ॥
फूलत फलत भयउ विधि बामा । जानि न जाइ काह परिनामा ॥
kalapabeli jimi bahu bidhi lālī | sīṃci saneha-salila pratipālī ||
phūlata phalata bhayau vidhi bāmā | jāni na jāi kāha parināmā ||
पलँग-पीठ तजि गोद हिंड़ोरा । सियँ न दीन्ह पग अवनि कठोरा ॥
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप-वाति नहिँ टारन कहऊँ ॥
palam̐ga-pīṭha taji goda hiṃr̤orā | siyam̐ na dīnha paga avani kaṭhorā ||
jianamūri jimi jogavata rahaūm̐ | dīpa-vāti nahim̐ ṭārana kahaūm̐ ||
सोइ सिय चलन चहति बन साथा । आयसु काह होइ रघुनाथा ॥
चन्द किरन रस रसिक चकोरी । रबि-रुख नयन सकइ किमि जोरी ॥
soi siya calana cahati bana sāthā | āyasu kāha hoi raghunāthā ||
canda kirana rasa rasika cakorī | rabi-rukha nayana sakai kimi jorī ||
करि केहरि निसिचर चरहिँ, दुष्ट-जन्तु बन भूरि ।
विष-बाटिकाँ कि सोह सुत, सुभग सजीवनि-मूरि ॥
kari kehari nisicara carahim̐, duṣṭa-jantu bana bhūri |
viṣa-bāṭikām̐ ki soha suta, subhaga sajīvani-mūri ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0