अयोध्याकाण्ड

अध्याय 5: मंत्रियों ने राजा का निर्णय सराहा

5 श्लोक · 5 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

मंत्रियों ने राजा का निर्णय सराहा

प्रसन्न राजा महल में आए और सेवकों, मंत्रियों तथा सुमन्त्र को बुलाया। उन्होंने जयजीव कहकर सिर नवाया और राजा ने मंगल वचन सुनाए कि आज गुरु ने कहा है कि श्रीराम को युवराज पद दो। यदि पंचों को भी यह मत ठीक लगे तो हर्ष से श्रीराम का तिलक करो। यह प्रिय वाणी सुनकर मंत्री ऐसे आनन्दित हुए मानो मनचाहे पौधे पर पानी पड़ गया हो। हाथ जोड़कर वे विनती करते हैं कि जगत के स्वामी करोड़ों वर्ष जिएँ। आपने जगत के मंगल का उत्तम कार्य सोचा है, नाथ, शीघ्र कीजिए, देर न लगाइए। यह सुनकर राजा का आनन्द ऐसे बढ़ा जैसे बढ़ती बेल को अच्छी डाल मिल गई हो। राजा ने कहा कि अभिषेक के लिए मुनिराज जो आज्ञा दें, वही शीघ्र करो।

5.1

मुदित महीपति मन्दिर आये । सेवक सचिव सुमन्त्र बोलाये ॥
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाये । भूप सुमङ्गल बचन सुनाये ॥

mudita mahīpati mandira āye | sevaka saciva sumantra bolāye ||
kahi jayajīva sīsa tinha nāye | bhūpa sumaṅgala bacana sunāye ||

5.2

जौँ पाँचहि मत लागइ नीका । करहु हरषि हियँ रामहिँ टीका ॥
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी । अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी ॥

jaum̐ pām̐cahi mata lāgai nīkā | karahu haraṣi hiyam̐ rāmahim̐ ṭīkā ||
maṃtrī mudita sunata priya bānī | abhimata biravam̐ pareu janu pānī ||

5.3

बिनती सचिव करहिँ कर जोरी । जिअहु जगतपति बरिस करोरी ॥
जग मङ्गल भल काज बिचारा । बेगिअ नाथ न लाइअ बारा ॥

binatī saciva karahim̐ kara jorī | jiahu jagatapati barisa karorī ||
jaga maṅgala bhala kāja bicārā | begia nātha na lāia bārā ||

5.4

नृपहि मोद सुनि सचिव सुभाखा । बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा ॥

nṛpahi moda suni saciva subhākhā | bar̤hata bauṃr̤a janu lahī susākhā ||

दो॰ 5दोहा

कहेउ भूप मुनिराज कर, जोइ जोइ आयसु होइ ।
राम-राज-अभिषेक हित, बेगि करहु सोइ सोइ ॥

kaheu bhūpa munirāja kara, joi joi āyasu hoi |
rāma-rāja-abhiṣeka hita, begi karahu soi soi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0