अयोध्याकाण्ड

अध्याय 47: पुरवासी कैकेयी को कोसते हैं

5 श्लोक · 47 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

पुरवासी कैकेयी को कोसते हैं

अवध के लोग कहते हैं कि विधाता ने अन्तिम घड़ी में बात बिगाड़ दी, और जहाँ तहाँ कैकेयी को गालियाँ देते हैं। इस पापिनी को क्या सूझा कि छाए हुए घर में आग लगा दी? यह अपने हाथों आँखें निकालकर भी देखना चाहती है, अमृत फेंककर विष चखना चाहती है। यह कुटिल, कठोर, अभागी रघुवंश रूपी बाँस के वन में आग बन गई। राम तो इसे सदा प्राणों के समान प्रिय थे, फिर यह कुटिलता क्यों? फिर वे कवियों के कहे अनुसार नारी के स्वभाव को अगम बताते हैं, कि अपनी परछाईं भले पकड़ में आ जाए, नारी की गति नहीं जानी जाती। आग क्या नहीं जलाती, प्रबल अबला क्या नहीं कर सकती, और काल किसे नहीं खाता?

47.1

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी । जहँ तहँ देहिँ कैकेइहि गारी ॥
एहि पापिनिहिँ बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पावकु धरेऊ ॥

milehi mājha bidhi bāta begārī | jaham̐ taham̐ dehim̐ kaikeihi gārī ||
ehi pāpinihim̐ būjhi kā pareū | chāi bhavana para pāvaku dhareū ||

47.2

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारि सुधा विष चाहत चीखा ॥
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघुबंस-बेनु बन आगी ॥

nija kara nayana kār̤hi caha dīkhā | ḍāri sudhā viṣa cāhata cīkhā ||
kuṭila kaṭhora kubuddhi abhāgī | bhai raghubaṃsa-benu bana āgī ||

47.3

पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महँ सोक-ठाट धरि ठाटा ॥
सदा राम एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिल-पल ठाना ॥

pālava baiṭhi per̤a ehiṃ kāṭā | sukha maham̐ soka-ṭhāṭa dhari ṭhāṭā ||
sadā rāma ehi prāna samānā | kārana kavana kuṭila-pala ṭhānā ||

47.4

सत्य कहहिँ कवि नारि सुभाऊ । सब विधि अगह अगाध दुराऊ ॥
निज प्रतिबिम्ब बरुक गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥

satya kahahim̐ kavi nāri subhāū | saba vidhi agaha agādha durāū ||
nija pratibimba baruka gahi jāī | jāni na jāi nāri gati bhāī ||

दो॰ 47दोहा

काह न पावक जारि सक, का न समुद्र समाइ ।
का न करइ अबला प्रबल, केहि जग काल न खाइ ॥

kāha na pāvaka jāri saka, kā na samudra samāi |
kā na karai abalā prabala, kehi jaga kāla na khāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0