रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट-सनेह जनाई ॥
सपथ तुम्हार भरत कइ आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥
rahasī rāni rāma rukha pāī | bolī kapaṭa-saneha janāī ||
sapatha tumhāra bharata kai ānā | hetu na dūsara maiṃ kachu jānā ||
5 श्लोक · 43 में से 326
श्रीराम का रुख देखकर कैकेयी प्रसन्न हुई और कपट भरा स्नेह दिखाकर बोली। तुम्हारी और भरत की शपथ, मैं कोई दूसरा कारण नहीं जानती। तुम अपराध के योग्य नहीं, माता पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो, और उनके वचन में लगे रहते हो। पिता को समझाओ, जिससे बुढ़ापे में उन्हें अपयश न लगे; जिनके पुण्य ने तुम जैसा पुत्र दिया, उनका निरादर उचित नहीं। उस कुमुख के शुभ वचन ऐसे लगते हैं जैसे मगध में गया आदि तीर्थ। फिर भी श्रीराम को माता के सब वचन अच्छे लगे, जैसे गंगा में मिलकर हर जल सुहावना हो जाता है। राजा की मूर्छा टूटी, राम को स्मरण कर उन्होंने करवट ली, और मन्त्री ने विनय से राम के आने की सूचना दी।
रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट-सनेह जनाई ॥
सपथ तुम्हार भरत कइ आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥
rahasī rāni rāma rukha pāī | bolī kapaṭa-saneha janāī ||
sapatha tumhāra bharata kai ānā | hetu na dūsara maiṃ kachu jānā ||
तुम्ह अपराध जोग नहिँ ताता । जननी जनक बन्धु सुख दाता ॥
राम सत्य सब जो कछु कहहू । तुम्ह पितु-मातु बचन-रत अहहू ॥
tumha aparādha joga nahim̐ tātā | jananī janaka bandhu sukha dātā ||
rāma satya saba jo kachu kahahū | tumha pitu-mātu bacana-rata ahahū ||
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई । चौथे पन जेहिं अजस न होई ॥
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे । उचित न तासु निरादर कीन्हे ॥
pitahi bujhāi kahahu bali soī | cauthe pana jehiṃ ajasa na hoī ||
tumha sama suana sukṛta jehiṃ dīnhe | ucita na tāsu nirādara kīnhe ||
लागहिँ कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहँ गयादिक तीरथ जैसे ॥
रामहि मातु बचन सब भाये । जिमि सुरसरि-गत सलिल सुहाये ॥
lāgahim̐ kumukha bacana subha kaise | magaham̐ gayādika tīratha jaise ||
rāmahi mātu bacana saba bhāye | jimi surasari-gata salila suhāye ||
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि, नृप फिरि करवट लीन्ह ।
सचिव राम आगमन कहि, बिनय समय सम कीन्ह ॥
gai muruchā rāmahi sumiri, nṛpa phiri karavaṭa līnha |
saciva rāma āgamana kahi, binaya samaya sama kīnha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0