इस प्रकार भरत वन में फिरते हैं, और उनका नियम और प्रेम देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जलाशय, भूमि के भाग, पक्षी, मृग, वृक्ष, घास, पर्वत, वन और बाग, जो सुन्दर, विचित्र और विशेष पवित्र हैं, उन सबको दिव्य देखकर भरत पूछते हैं, और ऋषिराज प्रसन्न मन से उनका कारण, नाम, गुण और पुण्य प्रभाव बताते हैं। कहीं स्नान, कहीं प्रणाम, कहीं मन को भाने वाले दृश्य देखना, कहीं आज्ञा पाकर बैठकर सीता सहित रघुराई का स्मरण। उनका स्वभाव, स्नेह और सेवा देखकर वनदेवता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। ढाई पहर दिन बीतने पर वे लौटकर प्रभु के चरणकमलों के दर्शन करते हैं। भरत ने पाँच दिन में सब स्थल और तीर्थ देख लिये; फिर हरि हर का सुयश कहते सुनते दिन बीता और साँझ हुई।