अयोध्याकाण्ड

अध्याय 303: तुलसी भरत की महिमा कह नहीं पाते

5 श्लोक · 303 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

तुलसी भरत की महिमा कह नहीं पाते

कृपासिन्धु ने देखा कि लोग अपने स्नेह और इन्द्र के भारी छल से दुःखी हैं। सारी सभा की बुद्धि को भरत की भक्ति ने बाँध रखा है। वे चित्र में लिखे से राम को देखते हैं। भरत की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुखद और कहने में कठिन है। जिनकी भक्ति का लेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश प्रेम में मग्न हो गए, उनकी महिमा तुलसी कैसे कहे? भक्ति के कारण सुमति हृदय में हुलसती तो है, पर अपने को छोटा और महिमा को बड़ा जानकर सकुचा जाती है; उसकी गति बालक के वचनों जैसी है। भरत का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है, जो भक्तों के हृदय रूपी आकाश में उदित है, और सुमति चकोरी उसे एकटक निहार रही है।

303.1

कृपासिन्धु लखि लोग दुखारे । निज सनेहँ सुरपति छल भारे ॥
सभा राउ गुरु महिसुर मन्त्री । भरत भगति सब के मति जन्त्री ॥

kṛpāsindhu lakhi loga dukhāre | nija saneham̐ surapati chala bhāre ||
sabhā rāu guru mahisura mantrī | bharata bhagati saba ke mati jantrī ||

303.2

रामहिँ चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई । सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥

rāmahim̐ citavata citra likhe se | sakucata bolata bacana sikhe se ||
bharata prīti nati binaya bar̤āī | sunata sukhada baranata kaṭhināī ||

303.3

जासु बिलोकि भगति लवलेसू । प्रेम मगन मुनि-गन मिथिलेसू ॥
महिमा तासु कहइ किमि तुलसी । भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी ॥

jāsu biloki bhagati lavalesū | prema magana muni-gana mithilesū ||
mahimā tāsu kahai kimi tulasī | bhagati subhāyam̐ sumati hiyam̐ hulasī ||

303.4

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी । कविकुल-कानि मानि सकुचानी ॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई । मति गति बाल-बचन की नाँई ॥

āpu choṭi mahimā bar̤i jānī | kavikula-kāni māni sakucānī ||
kahi na sakati guna ruci adhikāī | mati gati bāla-bacana kī nām̐ī ||

दो॰ 303दोहा

भरत बिमल जस बिमल-बिधु, सुमति चकोर-कुमारि ।
उदित बिमल जन हृदय नभ, एक टक रही निहारि ॥

bharata bimala jasa bimala-bidhu, sumati cakora-kumāri |
udita bimala jana hṛdaya nabha, eka ṭaka rahī nihāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0