कपट-कुचालि-सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन-काजू ॥
काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥
kapaṭa-kucāli-sīvam̐ surarājū | para akāja priya āpana-kājū ||
kāka samāna pākaripu rītī | chalī malīna katahum̐ na pratītī ||
5 श्लोक · 302 में से 326
सुरराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा हैं, कौए की भाँति छली। पहले कुमन्त्रणा करके उन्होंने कपट बटोरा और वह उचाट सबके सिर डाल दिया। देवमाया से सब लोग मोहित हो गए, पर राम का अतिशय प्रेम उनसे नहीं छूटा। भय और उचाट से मन ठिकाने नहीं; क्षण में यहाँ रहने की रुचि होती है, क्षण में घर सुहाता है। प्रजा की दुविधा भरी मनोदशा वैसी है जैसे नदी और समुद्र के संगम का जल। यह देखकर कृपानिधान मन में हँसकर कहते हैं, इन्द्र जवान कुत्ते जैसा है। भरत, जनक, मुनिजन, मन्त्री और सचेत साधुओं को छोड़कर देवमाया सबको, जो जैसा योग्य था, लग गई।
कपट-कुचालि-सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन-काजू ॥
काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥
kapaṭa-kucāli-sīvam̐ surarājū | para akāja priya āpana-kājū ||
kāka samāna pākaripu rītī | chalī malīna katahum̐ na pratītī ||
प्रथम कुमत करि कपट सँकेला । सो उचाट सब कें सिर मेला ॥
सुर-माया सब लोग बिमोहे । राम-प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥
prathama kumata kari kapaṭa sam̐kelā | so ucāṭa saba keṃ sira melā ||
sura-māyā saba loga bimohe | rāma-prema atisaya na bichohe ||
भय उचाट बस मन घर नाहीं । छन चल रुचि छन सदन सोहाहीं ॥
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी । सरित सिन्धु सङ्गम जनु बारी ॥
bhaya ucāṭa basa mana ghara nāhīṃ | chana cala ruci chana sadana sohāhīṃ ||
dubidha manogati prajā dukhārī | sarita sindhu saṅgama janu bārī ||
दुचित कतहुँ परितोष न लहहीं । एक एक सन मरम न कहहीं ॥
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू । सरिस स्वान मघवान जुबानू ॥
ducita katahum̐ paritoṣa na lahahīṃ | eka eka sana marama na kahahīṃ ||
lakhi hiyam̐ ham̐si kaha kṛpānidhānū | sarisa svāna maghavāna jubānū ||
भरत जनक मुनिजन सचिव, साधु सचेत बिहाइ ।
लागि देव-माया सबहि, जथाजोग जन पाइ ॥
bharata janaka munijana saciva, sādhu saceta bihāi |
lāgi deva-māyā sabahi, jathājoga jana pāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0