अयोध्याकाण्ड

अध्याय 3: दशरथ गुरु वसिष्ठ से मन की बात कहते हैं

5 श्लोक · 3 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

दशरथ गुरु वसिष्ठ से मन की बात कहते हैं

दशरथ मुनिनायक वसिष्ठ से कहते हैं कि श्रीराम अब सब प्रकार से योग्य हो गए हैं। सेवक, मंत्री, पुरवासी, और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं, सबको श्रीराम वैसे ही प्रिय हैं जैसे मुझे, मानो आपका आशीर्वाद ही उनमें देह धरकर शोभित है। ब्राह्मण परिवार सहित उन पर वैसा ही स्नेह करते हैं जैसा आप। जो गुरु-चरणों की धूल सिर पर रखते हैं, वे सारे वैभव को वश में कर लेते हैं, और यह अनुभव मुझ जैसा किसी को नहीं हुआ, क्योंकि उसी पावन रज को पूजकर मैंने सब पाया। अब मन में एक ही अभिलाषा है, जो आपकी कृपा से पूरी होगी। राजा का सहज स्नेह देखकर मुनि प्रसन्न होकर आज्ञा माँगते हैं और कहते हैं कि आपका नाम और यश ही सब मनोरथ देने वाला है।

3.1

कहइ भुआल सुनिय मुनिनायक । भये राम सब-बिधि सब-लायक ॥
सेवक सचिव सकल पुरबासी । जे हमारे अरि मित्र उदासी ॥

kahai bhuāla suniya munināyaka | bhaye rāma saba-bidhi saba-lāyaka ||
sevaka saciva sakala purabāsī | je hamāre ari mitra udāsī ||

3.2

सबहिँ राम प्रिय जेहि बिधि मोही । प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही ॥
बिप्र सहित परिवार गोसाँई । करहिँ छोह सब रौरिहि नाँई ॥

sabahim̐ rāma priya jehi bidhi mohī | prabhu asīsa janu tanu dhari sohī ||
bipra sahita parivāra gosām̐ī | karahim̐ choha saba raurihi nām̐ī ||

3.3

जे गुरु-चरन-रेनु सिर धरहीँ । ते जनु सकल बिभव बस करहीँ ॥
मोहि सम यह अनुभयउ न दूजें । सब पायउँ रज-पावनि पूजें ॥

je guru-carana-renu sira dharahīm̐ | te janu sakala bibhava basa karahīm̐ ||
mohi sama yaha anubhayau na dūjeṃ | saba pāyaum̐ raja-pāvani pūjeṃ ||

3.4

अब अभिलाष एक मन मोरें । पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें ॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज-सनेहू । कहेउ नरेस रजायसु देहू ॥

aba abhilāṣa eka mana moreṃ | pūjihi nātha anugraha toreṃ ||
muni prasanna lakhi sahaja-sanehū | kaheu naresa rajāyasu dehū ||

दो॰ 3दोहा

राजन राउर नाम जस, सब अभिमत-दातार ।
फल अनुगामी महिप-मनि, मन-अभिलाष तुम्हार ॥

rājana rāura nāma jasa, saba abhimata-dātāra |
phala anugāmī mahipa-mani, mana-abhilāṣa tumhāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0