सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे । लखि गति ज्ञान बिराग बिरागे ॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन नाहीं । आये इहाँ कीन्ह भल नाहीं ॥
suni muni bacana janaka anurāge | lakhi gati jñāna birāga birāge ||
sithila saneham̐ gunata mana nāhīṃ | āye ihām̐ kīnha bhala nāhīṃ ||
5 श्लोक · 292 में से 326
मुनि के वचन सुनकर जनक प्रेम में डूब गए; उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य भी मानो वैराग्य खो बैठे। स्नेह से शिथिल होकर वे मन में सोचते हैं कि यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। राजा दशरथ ने राम को वन जाने को कहा और प्राण देकर अपने प्रेम को प्रमाणित किया; अब क्या हम उन्हें वन से और वन भेजकर विवेक की बड़ाई करते प्रसन्न लौटें? समय समझकर धीरज धरकर राजा समाज सहित भरत के पास गए। भरत ने आगे आकर स्वागत किया और उचित आसन दिया। तिरहुत के राजा बोले, तात भरत, तुम रघुबीर का स्वभाव जानते हो। राम सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबके शील और स्नेह को निभाते हैं, और संकोचवश संकट सह रहे हैं। जो आज्ञा दो, वह कहो।
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे । लखि गति ज्ञान बिराग बिरागे ॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन नाहीं । आये इहाँ कीन्ह भल नाहीं ॥
suni muni bacana janaka anurāge | lakhi gati jñāna birāga birāge ||
sithila saneham̐ gunata mana nāhīṃ | āye ihām̐ kīnha bhala nāhīṃ ||
रामहिं रायँ कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ॥
हम अब बन तेँ बनहिँ पठाई । प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई ॥
rāmahiṃ rāyam̐ kaheu bana jānā | kīnha āpu priya prema pravānā ||
hama aba bana tem̐ banahim̐ paṭhāī | pramudita phiraba bibeka bar̤āī ||
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी । भये प्रेम बस बिकल बिसेखी ॥
समउ समुझि धरि धीरज राजा । चले भरत पहिँ सहित समाजा ॥
tāpasa muni mahisura suni dekhī | bhaye prema basa bikala bisekhī ||
samau samujhi dhari dhīraja rājā | cale bharata pahim̐ sahita samājā ||
भरत आइ आगें भइ लीन्हे । अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ॥
तात भरत कह तेरहुति राऊ । तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ॥
bharata āi āgeṃ bhai līnhe | avasara sarisa suāsana dīnhe ||
tāta bharata kaha terahuti rāū | tumhahi bidita raghubīra subhāū ||
राम सत्यव्रत धरम-रत, सब कर सील सनेहु ।
सङ्कट सहत सकोच बस, कहिअ जो आयसु देहु ॥
rāma satyavrata dharama-rata, saba kara sīla sanehu |
saṅkaṭa sahata sakoca basa, kahia jo āyasu dehu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0