अयोध्याकाण्ड

अध्याय 291: वसिष्ठ राम के वचन जनक तक ले जाते हैं

5 श्लोक · 291 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

वसिष्ठ राम के वचन जनक तक ले जाते हैं

वसिष्ठ कहते हैं, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाए जहाँ राम के चरण कमलों में भाव नहीं; जहाँ राम प्रेम प्रधान नहीं, वहाँ योग कुयोग है और ज्ञान अज्ञान। तुम्हारे बिना सब दुःखी हैं और तुमसे ही सुखी; जिसके मन में जो है, तुम जानते हो। तुम्हारी आज्ञा सबके सिर पर है, कृपालु सबकी गति भली भाँति जानते हैं। अब तुम आश्रम पधारो। यह कहकर मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गए। राम चले गए और ऋषि जनक के पास आए। गुरु ने राजा को राम के वचन सुनाए, जो शील, स्नेह और सहज स्वभाव से सुहावने थे। बोले, महाराज, अब वही कीजिए जिसमें धर्म सहित सबका हित हो। आप ज्ञान के भण्डार और धर्म में धीर हैं; इस समय आपके बिना इस असमंजस को मिटाने में कौन समर्थ है?

291.1

सो सुख करम धरम जरि जाऊ । जहँ न राम-पद-पङ्कज भाऊ ॥
जोग कुजोग ज्ञान अज्ञानू । जहँ नहिँ राम प्रेम परधानू ॥

so sukha karama dharama jari jāū | jaham̐ na rāma-pada-paṅkaja bhāū ||
joga kujoga jñāna ajñānū | jaham̐ nahim̐ rāma prema paradhānū ||

291.2

तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं । तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं ॥
राउर आयसु सिर सबही कें । बिदित कृपालहि गति सब नीकें ॥

tumha binu dukhī sukhī tumha tehīṃ | tumha jānahu jiya jo jehi kehīṃ ||
rāura āyasu sira sabahī keṃ | bidita kṛpālahi gati saba nīkeṃ ||

291.3

आपु आश्रमहिं धारिअ पाऊ । भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ ॥
करि प्रनाम तब राम सिधाये । रिषि धरि धीर जनक पहिँ आये ॥

āpu āśramahiṃ dhāria pāū | bhayau saneha sithila munirāū ||
kari pranāma taba rāma sidhāye | riṣi dhari dhīra janaka pahim̐ āye ||

291.4

राम बचन गुरु नृपहि सुनाये । सील सनेह सुभायँ सुहाये ॥
महाराज अब कीजिय सोई । सब कर धरम सहित हित होई ॥

rāma bacana guru nṛpahi sunāye | sīla saneha subhāyam̐ suhāye ||
mahārāja aba kījiya soī | saba kara dharama sahita hita hoī ||

दो॰ 291दोहा

ज्ञान-निधान सुजान सुचि, धरम धीर नरपाल ।
तुम्ह बिनु असमञ्जस समन, को समरथ एहि काल ॥

jñāna-nidhāna sujāna suci, dharama dhīra narapāla |
tumha binu asamañjasa samana, ko samaratha ehi kāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0