अयोध्याकाण्ड

अध्याय 286: जनक तपस्विनी वेष में सीता को हृदय लगाते हैं

5 श्लोक · 286 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

जनक तपस्विनी वेष में सीता को हृदय लगाते हैं

वैदेही अपने प्रिय परिजनों से जो जिस योग्य था, उसी प्रकार मिलीं। जानकी को तपस्वी वेष में देखकर सब विशेष विषाद से विकल हो गए। राम के गुरु की आज्ञा लेकर जनक डेरे पर आए और सीता को देखा। उन्होंने अपने पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी जानकी को हृदय से लगा लिया। हृदय में प्रेम का सागर उमड़ पड़ा, राजा का मन मानो प्रयाग हो गया, जहाँ सीता स्नेह का वटवृक्ष बढ़ा हुआ दीखा और उस पर राम प्रेम रूपी शिशु सुशोभित है; मानो चिरजीवी मुनि ने ज्ञान से विकल होकर डूबते हुए बालक का सहारा पा लिया। विदेह की बुद्धि मोह में मग्न नहीं; यह तो सिय रघुबर के स्नेह की महिमा है। माता पिता को स्नेहवश विकल देखकर धरणीसुता ने समय और धर्म विचारकर धीरज धरा।

286.1

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही । जो जेहि जोग भाँति तेहि तेही ॥
तापस बेष जानकी देखी । सा सब बिकल विषाद बिसेखी ॥

priya parijanahi milī baidehī | jo jehi joga bhām̐ti tehi tehī ||
tāpasa beṣa jānakī dekhī | sā saba bikala viṣāda bisekhī ||

286.2

जनक राम-गुरु आयसु पाई । चले थलहि सिय देखी आई ॥
लीन्ह लाइ उर जनक जानकी । पाहुन पावन पेम प्रान की ॥

janaka rāma-guru āyasu pāī | cale thalahi siya dekhī āī ||
līnha lāi ura janaka jānakī | pāhuna pāvana pema prāna kī ||

286.3

उर उमगेउ अम्बुधि अनुरागू । भयउ भूप मन मनहुँ पयागू ॥
सिय-सनेह बट बाढ़त जोहा । ता पर राम-पेम-सिसु सोहा ॥

ura umageu ambudhi anurāgū | bhayau bhūpa mana manahum̐ payāgū ||
siya-saneha baṭa bār̤hata johā | tā para rāma-pema-sisu sohā ||

286.4

चिरजीवी मुनि ज्ञान विकल जनु । बूड़त लहेउ बाल-अवलम्बनु ॥
मोह मगन मति नहिँ बिदेह की । महिमा सिय-रघुबर-सनेह की ॥

cirajīvī muni jñāna vikala janu | būr̤ata laheu bāla-avalambanu ||
moha magana mati nahim̐ bideha kī | mahimā siya-raghubara-saneha kī ||

दो॰ 286दोहा

सिय पितु मातु सनेह बस, बिकल न सकी सँभारि ।
धरनि-सुता धीरज धरेउ, समउ सुधरम बिचारि ॥

siya pitu mātu saneha basa, bikala na sakī sam̐bhāri |
dharani-sutā dhīraja dhareu, samau sudharama bicāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0