अयोध्याकाण्ड

अध्याय 285: सुनयना याज्ञवल्क्य का वचन सुनाती हैं

5 श्लोक · 285 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सुनयना याज्ञवल्क्य का वचन सुनाती हैं

जनकप्रिया ने कौसल्या के पवित्र चरण पकड़ लिये। बोलीं, देवि, दशरथ की गृहिणी और राम की माता को ऐसी विनय शोभा देती है। बड़े लोग अपने छोटों का भी आदर करते हैं, जैसे अग्नि धुएँ को और पर्वत सिर पर तृण को धारण करता है। राजा कर्म, मन और वाणी से आपके सेवक हैं, और महेश भवानी सदा आपके सहायक हैं। जगत में आपकी सहायता योग्य कौन है? क्या दीपक सूर्य का सहायक बनकर सोहता है? राम वन जाकर देवताओं का काम करेंगे और फिर अवधपुर में अचल राज्य करेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य पहले ही कह चुके हैं, मुनि का कहा व्यर्थ नहीं होता। फिर सीता के लिये विनती करके वे सीता सहित चलीं।

285.1

लखि सनेह सुनि बचन विनीता । जनक-प्रिया गहि पाय पुनीता ॥
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी । दसरथ-घरिनि राम-महतारी ॥

lakhi saneha suni bacana vinītā | janaka-priyā gahi pāya punītā ||
debi ucita asi binaya tumhārī | dasaratha-gharini rāma-mahatārī ||

285.2

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं । अगिनि धूम गिरि-सिर-तृन धरहीँ ॥
सेवक राउ करम-मन-बानी । सदा सहाय महेस भवानी ॥

prabhu apane nīcahu ādarahīṃ | agini dhūma giri-sira-tṛna dharahīm̐ ||
sevaka rāu karama-mana-bānī | sadā sahāya mahesa bhavānī ||

285.3

रउरे अङ्ग जोग जग को है । दीप सहाय कि दिनकर सोहै ॥
राम जाइ बन करि सुर काजू । अचल अवधपुर करिहहिँ राजू ॥

raure aṅga joga jaga ko hai | dīpa sahāya ki dinakara sohai ||
rāma jāi bana kari sura kājū | acala avadhapura karihahim̐ rājū ||

285.4

अमर नाग नर राम-बाहु-बल । सुख बसिहहिं अपनें अपने थल ॥
यह सब जागबलिक कहि राखा । देबि न होइ मुधा मुनि भाखा ॥

amara nāga nara rāma-bāhu-bala | sukha basihahiṃ apaneṃ apane thala ||
yaha saba jāgabalika kahi rākhā | debi na hoi mudhā muni bhākhā ||

दो॰ 285दोहा

अस कहि पग परि पेम अति, सिय हित विनय सुनाइ ।
सिय समेत सिय-मातु तब, चली सुआयसु पाई ॥

asa kahi paga pari pema ati, siya hita vinaya sunāi |
siya sameta siya-mātu taba, calī suāyasu pāī ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0