रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई ॥
रखिअहिं लखन भरत गबनहिं बन । जौँ यह मत मानै महीप मन ॥
rāni rāya sana avasaru pāī | apanī bhām̐ti kahaba samujhāī ||
rakhiahiṃ lakhana bharata gabanahiṃ bana | jaum̐ yaha mata mānai mahīpa mana ||
5 श्लोक · 284 में से 326
कौसल्या सुनयना से कहती हैं कि अवसर पाकर रानी राजा को अपनी रीति से समझाकर कहें: लक्ष्मण को रख लिया जाए और भरत वन जाएँ। यदि राजा के मन को यह मत भाए, तो सोच विचारकर अच्छा उपाय करें। मुझे भरत का भारी सोच है; उनके मन में गूढ़ स्नेह है, घर रहने में मुझे उनका भला नहीं दीखता। सब रानियाँ करुणरस में डूब गईं। आकाश से फूल बरसे, धन्य धन्य की ध्वनि हुई; सिद्ध, योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गए। सारा रनिवास ठगा सा रह गया, तब सुमित्रा ने धीरज से कहा, देवि, दो घड़ी रात बीत गई। राम माता प्रेम से उठीं और सच्चे भाव से बोलीं, शीघ्र अपने डेरे पधारिए; अब हमारी गति ईश्वर है, या मिथिलेश की सहायता।
रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई ॥
रखिअहिं लखन भरत गबनहिं बन । जौँ यह मत मानै महीप मन ॥
rāni rāya sana avasaru pāī | apanī bhām̐ti kahaba samujhāī ||
rakhiahiṃ lakhana bharata gabanahiṃ bana | jaum̐ yaha mata mānai mahīpa mana ||
तौ भल जतन करब सुबिचारी । मेरे सोच भरत कर भारी ॥
गूढ़ सनेह भरत मन माही । रहें नीक मोहि लागत नाहीॅं ॥
tau bhala jatana karaba subicārī | mere soca bharata kara bhārī ||
gūr̤ha saneha bharata mana māhī | raheṃ nīka mohi lāgata nāhīॅṃ ||
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी । सब भइँ मग़न करुन रस रानी ॥
नभ प्रसून भरि धन्य धन्य धुनि । सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि ॥
lakhi subhāu suni sarala subānī | saba bhaim̐ maġana karuna rasa rānī ||
nabha prasūna bhari dhanya dhanya dhuni | sithila saneham̐ siddha jogī muni ||
सब रनिवास बिथकि लखि रहेऊ । तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ ॥
देबि दंड जुग जामिनि बीती । राम-मातु सुनि उठी सप्रीती ॥
saba ranivāsa bithaki lakhi raheū | taba dhari dhīra sumitrām̐ kaheū ||
debi daṃḍa juga jāmini bītī | rāma-mātu suni uṭhī saprītī ||
बेगि पाउ धारिअ थलहि, कह सनेहँ सतिभाय ।
हमरें तौ अब ईस-गति, कै मिथिलेस सहाय ॥
begi pāu dhāria thalahi, kaha saneham̐ satibhāya |
hamareṃ tau aba īsa-gati, kai mithilesa sahāya ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0