अयोध्याकाण्ड

अध्याय 275: चित्रकूट में जनक और श्रीराम का मिलन

5 श्लोक · 275 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

चित्रकूट में जनक और श्रीराम का मिलन

भाई, मन्त्री, गुरु और पुरजनों को लेकर रघुनाथ अगवानी को चलते हैं। जनक कामदगिरि को देखते ही प्रणाम करके रथ छोड़ देते हैं। राम दर्शन की लालसा ऐसी है कि किसी को मार्ग की थकान का लेश नहीं; मन तो वहाँ है जहाँ रघुबर और वैदेही हैं, और मन के बिना देह के सुख दुःख की सुधि किसे। पास पहुँचकर दोनों दल आदर से मिलते हैं। जनक मुनियों के चरण वन्दते हैं, रघुनन्दन ऋषियों को प्रणाम करते हैं, और भाइयों सहित राजा से मिलकर उन्हें समाज समेत आश्रम ले चलते हैं। दोहे में आश्रम शान्तरस से भरा सागर है और जनक की सेना करुणा की नदी, जिसे रघुनाथ उसकी ओर लिये जा रहे हैं।

275.1

भाइ सचिव गुरु पुरजन साधा । आगें गवन कीन्ह रघुनाथा ॥
गिरिवर, दीख जनकपति जबहीं । करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं ॥

bhāi saciva guru purajana sādhā | āgeṃ gavana kīnha raghunāthā ||
girivara, dīkha janakapati jabahīṃ | kari pranāma ratha tyāgeu tabahīṃ ||

275.2

राम-दरस लालसा उछाहू । पथ-श्रम लेस कलेस न काहू ॥
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही । बिनु मन तन दुख-सुख सुधि केही ॥

rāma-darasa lālasā uchāhū | patha-śrama lesa kalesa na kāhū ||
mana taham̐ jaham̐ raghubara baidehī | binu mana tana dukha-sukha sudhi kehī ||

275.3

आवत जनक चले एहि भाँती । सहित समाज प्रेम-मति माती ॥
आये निकट देखि अनुरागे । सादर मिलन परसपर लागे ॥

āvata janaka cale ehi bhām̐tī | sahita samāja prema-mati mātī ||
āye nikaṭa dekhi anurāge | sādara milana parasapara lāge ||

275.4

लगे जनक मुनिजन-पद बन्दन । रिषिन्ह प्रनाम कीन्ह रघुनन्दन ॥
भाइन्ह सहित राम मिलि राजहि । चले लवाइ समेत समाजहि ॥

lage janaka munijana-pada bandana | riṣinha pranāma kīnha raghunandana ||
bhāinha sahita rāma mili rājahi | cale lavāi sameta samājahi ||

दो॰ 275दोहा

आस्रम-सागर सान्त रस, पूरन पावन पाथ ।
सेन मनहुँ करुना-सरित, लिये जाहिँ रघुनाथ ॥

āsrama-sāgara sānta rasa, pūrana pāvana pātha |
sena manahum̐ karunā-sarita, liye jāhim̐ raghunātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0