अयोध्याकाण्ड

अध्याय 274: श्रीराम सबका सम्मान करते हैं, जनक आते हैं

5 श्लोक · 274 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम सबका सम्मान करते हैं, जनक आते हैं

पुरवासियों की प्रेम और भय भरी वाणी सुनकर योग और वैराग्य वाले ज्ञानी मुनि भी अपने ज्ञान को कोसते हैं। नित्यकर्म करके पुरजन पुलकित तन से श्रीराम को प्रणाम करते हैं। ऊँच, नीच, मध्यम, सभी नर नारी अपनी भावना के अनुसार दर्शन पाते हैं, और सावधान रघुनाथ सबका सम्मान करते हैं। लोग कहते हैं, बचपन से ही रघुबर नीति निभाते और प्रीति पहचानते आए हैं; वे शील और संकोच के सागर हैं, सरल स्वभाव के। गुण गाते हुए सब अपने भाग्य को सराहते हैं कि हम जैसे पुण्यात्मा थोड़े हैं, जिन्हें राम अपना जानते हैं। तभी मिथिलेश के आने का समाचार मिलता है और श्रीराम सभा सहित हड़बड़ाकर उठते हैं।

274.1

सुनि सनेह-भय पुरजन बानी । निन्दहिँ जोग बिरति मुनि ग्यानी ॥
एहि विधि नित्यकरम करि पुरजन । रामहिँ करहिं प्रनाम पुलकि तन ॥

suni saneha-bhaya purajana bānī | nindahim̐ joga birati muni gyānī ||
ehi vidhi nityakarama kari purajana | rāmahim̐ karahiṃ pranāma pulaki tana ||

274.2

ऊँच नीच मध्यम नर-नारी । लहहिँ दरस निज निज अनुहारी ॥
सावधान सबही सनमानहिँ । सकल सराहत कृपानिधानहिँ ॥

ūm̐ca nīca madhyama nara-nārī | lahahim̐ darasa nija nija anuhārī ||
sāvadhāna sabahī sanamānahim̐ | sakala sarāhata kṛpānidhānahim̐ ||

274.3

लरिकाइहिँ ते रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥
सील-सकोच-सिन्धु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥

larikāihim̐ te raghubara bānī | pālata nīti prīti pahicānī ||
sīla-sakoca-sindhu raghurāū | sumukha sulocana sarala subhāū ||

274.4

कहत राम गुन-गन अनुरागे । सब निज भाग सराहन लागे ॥
हम सम पुन्य-पुत्र जग थोरे । जिन्हहि राम जानत करि मोरे ॥

kahata rāma guna-gana anurāge | saba nija bhāga sarāhana lāge ||
hama sama punya-putra jaga thore | jinhahi rāma jānata kari more ||

दो॰ 274दोहा

प्रेम मगन तेहि समय सब, सुनि आवत मिथिलेस ।
सहित सभा सम्भ्रम उठेउ, रबिकुल-कमल-दिनेस ॥

prema magana tehi samaya saba, suni āvata mithilesa |
sahita sabhā sambhrama uṭheu, rabikula-kamala-dinesa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0