सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय-सरिस सुहाई ॥
भरत भगति तुम्हरें मन आई । तजहु सोच बिधि बात बनाई ॥
sītāpati sevaka sevakāī | kāmadhenu saya-sarisa suhāī ||
bharata bhagati tumhareṃ mana āī | tajahu soca bidhi bāta banāī ||
5 श्लोक · 266 में से 326
बृहस्पति कहते हैं, सीतापति के सेवक की सेवा सौ कामधेनुओं के समान सुहावनी है। तुम्हारे मन में भरत की भक्ति आई है, सोच छोड़ो, विधाता ने बात बना दी। हे देवराज, भरत का प्रभाव देखो, रघुराज उनके सहज स्वभाव के वश हैं। मन स्थिर करो, डर नहीं, भरत को राम की परछाईं जानो। देवगुरु और देवताओं का मत और सोच सुनकर अंतर्यामी प्रभु संकोच करते हैं। भरत अपने सिर भार जानकर मन में करोड़ों प्रकार से अनुमान करते हैं। विचारकर मन में ठीक करते हैं कि राम की आज्ञा में ही मेरा भला है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा, थोड़ी कृपा और स्नेह नहीं किया। सीतानाथ ने सब प्रकार अपार अनुग्रह किया, यह जानकर भरत प्रणाम करते हैं और दोनों करकमल जोड़कर बोलते हैं।
सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय-सरिस सुहाई ॥
भरत भगति तुम्हरें मन आई । तजहु सोच बिधि बात बनाई ॥
sītāpati sevaka sevakāī | kāmadhenu saya-sarisa suhāī ||
bharata bhagati tumhareṃ mana āī | tajahu soca bidhi bāta banāī ||
देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ ॥
मन थिर करहु देव डर नाहीॅं । भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥
dekhu devapati bharata prabhāū | sahaja subhāyam̐ bibasa raghurāū ||
mana thira karahu deva ḍara nāhīॅṃ | bharatahi jāni rāma parichāhīṃ ||
सुनो सुरगुरु सुर सम्मत सोचू । अन्तरजामी प्रभुहि सकोचू ॥
निज सिर भार भरत जियँ जाना । करत कोटि बिधि मन अनुमाना ॥
suno suraguru sura sammata socū | antarajāmī prabhuhi sakocū ||
nija sira bhāra bharata jiyam̐ jānā | karata koṭi bidhi mana anumānā ||
करि बिचार मन दीन्ही ठीका । राम-रजायसु आपन नीका ॥
निज पन तजि राखेउ पन मोरा । छोह सनेह कीन्ह नहिँ थोरा ॥
kari bicāra mana dīnhī ṭhīkā | rāma-rajāyasu āpana nīkā ||
nija pana taji rākheu pana morā | choha saneha kīnha nahim̐ thorā ||
कीन्ह अनुग्रह अमित अति, सब बिधि सीतानाथ ।
करि प्रनाम बोले भरत, जोरि जलज जुग हाथ ॥
kīnha anugraha amita ati, saba bidhi sītānātha |
kari pranāma bole bharata, jori jalaja juga hātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0