अयोध्याकाण्ड

अध्याय 253: भरत की सोच भरी रात

5 श्लोक · 253 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत की सोच भरी रात

भरत सोचते हैं, काल ने माता के बहाने कुचाल चली, जैसे पकते धान पर ईति का संकट आ पड़े। राम का अभिषेक किस प्रकार हो? मुझे एक भी उपाय नहीं सूझता। गुरु की आज्ञा मानकर वे अवश्य लौटेंगे, पर मुनि राम की रुचि जानकर ही कहेंगे। माता कौसल्या के कहने से रघुराज लौट आएँगे, पर क्या राम की माता कभी हठ करेंगी? यदि मैं हठ करूँ तो बड़ा कुकर्म होगा, सेवक का धर्म कैलास से भी भारी है। कोई युक्ति मन में नहीं ठहरती, सोचते सोचते रात बीत जाती है। सबेरे स्नान करके प्रभु को सिर नवाकर बैठते ही ऋषि उन्हें बुलवा भेजते हैं। गुरु के चरणों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर वे बैठते हैं और सारी सभा जुटती है।

253.1

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली । ईति भीति जस पाकत साली ॥
केहि बिधि होइ राम-अभिषेकू । मोहि अवकलत उपाउ न एकू ॥

kīnhī mātu misa kāla kucālī | īti bhīti jasa pākata sālī ||
kehi bidhi hoi rāma-abhiṣekū | mohi avakalata upāu na ekū ||

253.2

अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी । मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी ॥
मातु कहेहु बहुरहिं रघुराऊ । राम-जननि हठ करबि कि काऊ ॥

avasi phirahiṃ guru āyasu mānī | muni puni kahaba rāma ruci jānī ||
mātu kahehu bahurahiṃ raghurāū | rāma-janani haṭha karabi ki kāū ||

253.3

मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महँ कुसमउ बाम विधाता ॥
जौँ हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥

mohi anucara kara ketika bātā | tehi maham̐ kusamau bāma vidhātā ||
jaum̐ haṭha karaum̐ ta nipaṭa kukaramū | haragiri teṃ guru sevaka dharamū ||

253.4

एकउ जुगुति न मन ठहरानी । सोचत भरतहि रैनि बिहानी ॥
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई । बैठत पठये रिषयँ बोलाई ॥

ekau juguti na mana ṭhaharānī | socata bharatahi raini bihānī ||
prāta nahāi prabhuhi sira nāī | baiṭhata paṭhaye riṣayam̐ bolāī ||

दो॰ 253दोहा

गुरु-पद-पदुम प्रनाम करि, बैठे आयसु पाइ ।
बिप्र-महाजन सचिव सब, जुरे सभासद आइ ॥

guru-pada-paduma pranāma kari, baiṭhe āyasu pāi |
bipra-mahājana saciva saba, jure sabhāsada āi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0