अयोध्याकाण्ड

अध्याय 250: वनवासी अवध के लोगों को भेंट लाते हैं

5 श्लोक · 250 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

वनवासी अवध के लोगों को भेंट लाते हैं

कोल, किरात, भील और वनवासी सुंदर दोने बनाकर उनमें पवित्र, अमृत जैसा मधु भरते हैं और कंद, मूल, फल और अंकुरों की जूड़ियाँ लाते हैं। विनय और प्रणाम करके सबको देते हैं और स्वाद और नाम बताते हैं। लोग बदले में बहुत मूल्य देते हैं, पर वे नहीं लेते और राम की दुहाई देकर लौटा देते हैं। स्नेह में मग्न होकर मृदु वाणी से कहते हैं। आप पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं, राम की कृपा से आपके दर्शन पाए। आपका दर्शन हमारे लिए वैसा ही दुर्लभ है जैसे मरुभूमि के लिए गंगा की धारा। कृपालु राम गरीबनिवाज हैं, उनके परिजन और प्रजा भी राजा जैसे होने चाहिए। यह जानकर संकोच छोड़िए, हमारा स्नेह देखकर कृपा कीजिए और हमें कृतार्थ करने के लिए फल, तृण और अंकुर लीजिए।

250.1

कोल किरात भिल्ल बन बासी । मधु सुचि सुन्दर स्वाद सुधा सी ॥
भरि भरि परन-पुटीं रचि रूरी । कन्द मूल फल अङ्कुर-जूरी ॥

kola kirāta bhilla bana bāsī | madhu suci sundara svāda sudhā sī ||
bhari bhari parana-puṭīṃ raci rūrī | kanda mūla phala aṅkura-jūrī ||

250.2

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा । कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं । फेरत राम दोहाई देहीं ॥

sabahi dehiṃ kari binaya pranāmā | kahi kahi svāda bheda guna nāmā ||
dehiṃ loga bahu mola na lehīṃ | pherata rāma dohāī dehīṃ ||

250.3

कहहिँ सनेह मगन मृदु बानी । मानत साधु पेम पहिचानी ॥
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा । पावा दरसन राम प्रसादा ॥

kahahim̐ saneha magana mṛdu bānī | mānata sādhu pema pahicānī ||
tumha sukṛtī hama nīca niṣādā | pāvā darasana rāma prasādā ||

250.4

हमहिँ अगम अति दरस तुम्हारा । जस मरु-धरनि देवधुनि-धारा ॥
राम-कृपाल गरीब नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिय जस राजा ॥

hamahim̐ agama ati darasa tumhārā | jasa maru-dharani devadhuni-dhārā ||
rāma-kṛpāla garība nevājā | parijana prajau cahiya jasa rājā ||

दो॰ 250दोहा

यह जिय जानि सकोच तजि, करिय छोह लखि नेहु ।
हमहिं कृतारथ करन लगि, फल-तृन-अङ्कुर लेहु ॥

yaha jiya jāni sakoca taji, kariya choha lakhi nehu |
hamahiṃ kṛtāratha karana lagi, phala-tṛna-aṅkura lehu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0