अयोध्याकाण्ड

अध्याय 237: गुह बरगद और राम की पर्णकुटी दिखाते हैं

5 श्लोक · 237 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

गुह बरगद और राम की पर्णकुटी दिखाते हैं

तब केवट गुह दौड़कर ऊँचे पर चढ़ते हैं और भुजा उठाकर भरत से कहते हैं, नाथ, ये बड़े बड़े वृक्ष देखिए, पाकर, जामुन, आम और तमाल। इन वृक्षों के बीच एक सुंदर विशाल बरगद है जिसे देखकर मन मोहित होता है। उसके पत्ते नीले और घने हैं, फल लाल हैं, और उसकी अचल छाया सब ऋतुओं में सुख देती है। मानो विधाता ने सारी शोभा बटोरकर अँधेरे और अरुणाई की राशि रच दी हो। स्वामी, ये वृक्ष नदी के पास हैं जहाँ रघुवर की पर्णकुटी छाई है। तुलसी और अनेक सुहावने पेड़ कहीं सीता ने, कहीं लक्ष्मण ने लगाए हैं। बरगद की छाया में सीता ने अपने करकमलों से सुंदर वेदी बनाई है। वहाँ सीता और राम नित्य मुनियों के साथ बैठकर कथा, इतिहास, आगम, निगम और पुराण सुनते हैं।

237.1

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई । कहेउ भरत सन भुजा उठाई ॥
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला । पाकरि जम्बु रसाल तमाला ॥

taba kevaṭa ūm̐ceṃ car̤hi dhāī | kaheu bharata sana bhujā uṭhāī ||
nātha dekhiahiṃ biṭapa bisālā | pākari jambu rasāla tamālā ||

237.2

तिन्ह तरूबरन्ह मध्य बट सोहा । मज्जु बिसाल देखि मन मोहा ॥
नील-सघन-पल्ल्व फल-लाला । अबिरल छाहँ सुखद सब काला ॥

tinha tarūbaranha madhya baṭa sohā | majju bisāla dekhi mana mohā ||
nīla-saghana-pallva phala-lālā | abirala chāham̐ sukhada saba kālā ||

237.3

मानहुँ तिमिर-अरुन-मय रासी । बिरची बिधि सँकेलि सुखमा सी ॥
ये तरु सरित समीप गोसाँई । रघुबर परन-कुटी जहँ छाई ॥

mānahum̐ timira-aruna-maya rāsī | biracī bidhi sam̐keli sukhamā sī ||
ye taru sarita samīpa gosām̐ī | raghubara parana-kuṭī jaham̐ chāī ||

237.4

तुलसी तरुबर बिबिध सुहाये । कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाये ॥
बट-छायाँ बेदिका बनाई । सियँ निज-पानि-सरोज-सुहाई ॥

tulasī tarubara bibidha suhāye | kahum̐ kahum̐ siyam̐ kahum̐ lakhana lagāye ||
baṭa-chāyām̐ bedikā banāī | siyam̐ nija-pāni-saroja-suhāī ||

दो॰ 237दोहा

जहाँ बैठि मुनि-गन सहित, नित सिय राम सुजान ।
सुनहिँ कथा इतिहास सब, , आगम-निगम-पुरान ॥

jahām̐ baiṭhi muni-gana sahita, nita siya rāma sujāna |
sunahim̐ kathā itihāsa saba, , āgama-nigama-purāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0