अयोध्याकाण्ड

अध्याय 219: बृहस्पति की इन्द्र को सीख

5 श्लोक · 219 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

बृहस्पति की इन्द्र को सीख

देवगुरु बृहस्पति इन्द्र को साफ़ उपदेश देते हैं। श्रीराम को अपना सेवक सबसे प्यारा है। सेवक की सेवा से वे सुख मानते हैं और सेवक से वैर को सबसे बड़ा वैर गिनते हैं। यद्यपि वे सबके लिए सम हैं, उनमें न राग है न रोष, और संसार कर्मप्रधान है, तो भी वे भक्त और अभक्त के हृदय के अनुसार बरतते हैं। निर्गुण, एकरस ब्रह्म भक्तों के प्रेम के वश होकर सगुण राम बने। वेद, पुराण, साधु और देवता साक्षी हैं कि राम सदा सेवक की रुचि रखते हैं। इसलिए कुटिलता छोड़कर भरत के चरणों से प्रीति करो। भरत भक्तों के शिरोमणि हैं, परहित में लगे और दयालु। उनसे मत डरो।

219.1

सुनु सुरेस उपदेस हमारा । रामहि सेवक परम-पियारा ॥
मानत सुख सेवक सेवकाई । सेवक-बैर बैर-अधिकाई ॥

sunu suresa upadesa hamārā | rāmahi sevaka parama-piyārā ||
mānata sukha sevaka sevakāī | sevaka-baira baira-adhikāī ||

219.2

जद्यपि सम नहिँ राग न रोषू । गहहिँ न पाय पुन्य गुन दोषू ॥
करम-प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥

jadyapi sama nahim̐ rāga na roṣū | gahahim̐ na pāya punya guna doṣū ||
karama-pradhāna bisva kari rākhā | jo jasa karai so tasa phala cākhā ||

219.3

तदपि करहिँ सम विषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥
अगुन अलेप अमान एकरस । राम सगुन भये भगत-पेम-बस ॥

tadapi karahim̐ sama viṣama bihārā | bhagata abhagata hṛdaya anusārā ||
aguna alepa amāna ekarasa | rāma saguna bhaye bhagata-pema-basa ||

219.4

राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ॥
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत-पद-प्रीति सुहाई ॥

rāma sadā sevaka ruci rākhī | beda purāna sādhu sura sākhī ||
asa jiyam̐ jāni tajahu kuṭilāī | karahu bharata-pada-prīti suhāī ||

दो॰ 219दोहा

राम-भगत परहित-निरत, पर दुख दुखी दयाल ।
भगत-सिरोमनि भरत तेँ, जनि डर पहु सुरपाल ॥

rāma-bhagata parahita-nirata, para dukha dukhī dayāla |
bhagata-siromani bharata tem̐, jani ḍara pahu surapāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0