अयोध्याकाण्ड

अध्याय 218: बृहस्पति इन्द्र को छल से रोकते हैं

5 श्लोक · 218 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

बृहस्पति इन्द्र को छल से रोकते हैं

यह सुनकर देवगुरु मुस्कुराते हैं, उन्होंने जाना कि सहस्र नेत्र वाले इन्द्र बिना आँखों के हैं। माया के स्वामी के सेवक पर माया की जाए तो वह उलटी करने वाले पर ही पड़ती है, हे सुरराज। सुनो सुरेश, रघुनाथ का स्वभाव ऐसा है कि अपने अपराध पर वे कभी क्रोध नहीं करते, पर जो उनके भक्त का अपराध करता है, वह राम के क्रोध की आग में जलता है। लोक और वेद में यह इतिहास प्रसिद्ध है, यह महिमा दुर्वासा जानते हैं। भरत के समान राम का स्नेही कौन है? जगत राम को जपता है और राम भरत को। हे देवराज, रघुवर के भक्त का अहित मन में भी न लाओ, उससे लोक में अपयश, परलोक में दुःख और दिन दिन शोक बढ़ता है।

218.1

बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहस-नयन बिनु लोचन जाने ॥
मायापति-सेवक सन माया । करइ त उलटि परइ सुरराया ॥

bacana sunata suraguru musukāne | sahasa-nayana binu locana jāne ||
māyāpati-sevaka sana māyā | karai ta ulaṭi parai surarāyā ||

218.2

तब किछु कीन्ह राम-रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ॥
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिँ न काऊ ॥

taba kichu kīnha rāma-rukha jānī | aba kucāli kari hoihi hānī ||
sunu suresa raghunātha subhāū | nija aparādha risāhim̐ na kāū ||

218.3

जो अपराध भगत कर करई । राम-रोष-पावक सो जरई ॥
लोकहु बेद बिदित इतिहासा । यह महिमा जानहिँ दुरबासा ॥

jo aparādha bhagata kara karaī | rāma-roṣa-pāvaka so jaraī ||
lokahu beda bidita itihāsā | yaha mahimā jānahim̐ durabāsā ||

218.4

भरत सरिस को राम-सनेही । जग जप राम राम जप जेही ॥

bharata sarisa ko rāma-sanehī | jaga japa rāma rāma japa jehī ||

दो॰ 218दोहा

मनहुँ न आनिय अमरपति, रघुबर-भगत अकाज ।
अजस-लोक परलोक-दुख, दिन दिन सोक-समाज ॥

manahum̐ na āniya amarapati, raghubara-bhagata akāja |
ajasa-loka paraloka-dukha, dina dina soka-samāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0