अयोध्याकाण्ड

अध्याय 216: नंगे पाँव चित्रकूट की ओर

5 श्लोक · 216 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

नंगे पाँव चित्रकूट की ओर

भरत तीर्थराज में स्नान करके समाज सहित मुनि को सिर नवाते हैं। रास्ता जानने वालों को साथ लेकर वे चित्रकूट में चित्त लगाए चलते हैं। राम के सखा गुह का सहारा लिए वे ऐसे चलते हैं मानो अनुराग ने देह धरी हो। न पैरों में जूते हैं, न सिर पर छाया, उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म निष्कपट है। वे सखा से लक्ष्मण, राम और सीता के मार्ग की कथा पूछते हैं। जहाँ राम ठहरे थे वे स्थान और वृक्ष देखकर हृदय का अनुराग रोके नहीं रुकता। यह दशा देखकर देवता फूल बरसाते हैं और मार्ग की धरती कोमल हो जाती है। राम के जाते समय मार्ग वैसा सुखद नहीं हुआ जैसा भरत के जाते समय हुआ।

216.1

कीन्ह निमज्जन तीरथराजा । नाइ मुनिहि सिर सहित समाजा ॥
रिषि आयसु असीस सिर राखी । करि दंडवत बिनय बहु भाषी ॥

kīnha nimajjana tīratharājā | nāi munihi sira sahita samājā ||
riṣi āyasu asīsa sira rākhī | kari daṃḍavata binaya bahu bhāṣī ||

216.2

पथ-गति-कुसल साथ सब लीन्हे । चले चित्रकूटहिं चित दीन्हें ॥
रामसखा-कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ॥

patha-gati-kusala sātha saba līnhe | cale citrakūṭahiṃ cita dīnheṃ ||
rāmasakhā-kara dīnheṃ lāgū | calata deha dhari janu anurāgū ||

216.3

नहिँ पद त्रान सीस नहिँ छाया । प्रेम नेम ब्रत धरम अमाया ॥
लखन-राम-सिय पन्थ-कहानी । पूछत सखहि कहत मृदु बानी ॥

nahim̐ pada trāna sīsa nahim̐ chāyā | prema nema brata dharama amāyā ||
lakhana-rāma-siya pantha-kahānī | pūchata sakhahi kahata mṛdu bānī ||

216.4

राम-बास-थल बिटप बिलोकें । उर अनुराग रहत नहिँ रोकैं ॥
देखि दसा सुर बरिसहिँ फूला । भइ मृदु महि मग मङ्गल मूला ॥

rāma-bāsa-thala biṭapa bilokeṃ | ura anurāga rahata nahim̐ rokaiṃ ||
dekhi dasā sura barisahim̐ phūlā | bhai mṛdu mahi maga maṅgala mūlā ||

दो॰ 216दोहा

किये जाहिँ छाया जलद, सुखद बहइ बर बात ।
तस मग भयउ न राम कहँ, जस भा भरतहि जात ॥

kiye jāhim̐ chāyā jalada, sukhada bahai bara bāta |
tasa maga bhayau na rāma kaham̐, jasa bhā bharatahi jāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0