अयोध्याकाण्ड

अध्याय 207: भरद्वाज कहते हैं, भरत निर्दोष हैं

5 श्लोक · 207 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरद्वाज कहते हैं, भरत निर्दोष हैं

भरद्वाज कहते हैं, यह कहने पर भी कोई भला नहीं कहेगा, यद्यपि लोक और वेद दोनों इसे मानते हैं और विद्वान भी सहमत हैं। लोक और वेद का यही मत है कि पिता जिसे राज दे, वही पाता है। सत्यव्रती राजा ने तुम्हें बुलाकर राज, सुख, धर्म और बड़ाई देनी चाही। राम का वन जाना अनर्थ की जड़ था, जिसे सुनकर सारा विश्व पीड़ित हुआ। वह होनी के वश हुआ, नासमझ रानी ने कुचाल चली और अन्त में पछताई। उसमें भी तुम्हारा थोड़ा सा अपराध कहने वाला नीच, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज करते तो भी तुम्हें दोष न लगता और राम सुनकर संतुष्ट होते। रघुवर के चरणों का स्नेह जगत में सब मंगलों की जड़ है।

207.1

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोक-बेद बुध सम्मत दोऊ ॥
तात तुम्हार बिमल-जस गाई । पाइहि लोकहु-बेद बड़ाई ॥

yahau kahata bhala kahihi na koū | loka-beda budha sammata doū ||
tāta tumhāra bimala-jasa gāī | pāihi lokahu-beda bar̤āī ||

207.2

लोक बेद सम्मत सब कहई । जेहि पितु देइ राज सो लहई ॥
राउ सत्य-व्रत तुम्हहिँ बोलाई । देत राज-सुख धरम बड़ाई ॥

loka beda sammata saba kahaī | jehi pitu dei rāja so lahaī ||
rāu satya-vrata tumhahim̐ bolāī | deta rāja-sukha dharama bar̤āī ||

207.3

राम-गवनु-बन अनरथ-मूला । जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ॥
सो भावी-बस रानि अयानी । करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ॥

rāma-gavanu-bana anaratha-mūlā | jo suni sakala bisva bhai sūlā ||
so bhāvī-basa rāni ayānī | kari kucāli aṃtahum̐ pachitānī ||

207.4

तहउँ तुम्हार अलप अपराधू । कहइ से अधम अयान असाधू ॥
करतेहु राज त तुम्हहिँ न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ॥

tahaum̐ tumhāra alapa aparādhū | kahai se adhama ayāna asādhū ||
karatehu rāja ta tumhahim̐ na doṣū | rāmahi hota sunata saṃtoṣū ||

दो॰ 207दोहा

अब अति कीन्हेहु भरत भल, तुम्हहिॅ उचित मत एहु ।
सकल सुमङ्गल-मूल जग, रघुबर चरन सनेहु ॥

aba ati kīnhehu bharata bhala, tumhahiॅ ucita mata ehu |
sakala sumaṅgala-mūla jaga, raghubara carana sanehu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0