अयोध्याकाण्ड

अध्याय 206: भरद्वाज मुनि का भरत से स्नेह

5 श्लोक · 206 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरद्वाज मुनि का भरत से स्नेह

तीर्थराज प्रयाग के निवासी, वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और विरक्त सब प्रसन्न हैं और दस पाँच मिलकर आपस में कहते हैं कि भरत स्नेही, शीलवान, पवित्र और सच्चे हैं। राम के सुन्दर गुणों का बखान सुनते हुए भरत मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज के पास आते हैं। उन्हें दंडवत करते देख मुनि उन्हें अपना साक्षात सौभाग्य मानते हैं। दौड़कर उठाते हैं, हृदय से लगाते हैं और आशीर्वाद देकर कृतार्थ करते हैं। आसन पाकर भरत सिर झुकाकर बैठते हैं, मानो संकोच के घर में भागकर घुस जाना चाहते हों। उनका शील और संकोच देखकर ऋषि पहले ही बोल उठते हैं, सुनो भरत, हमने सब समाचार पाया है, विधाता की करनी पर किसी का बस नहीं। तात, कैकेयी का दोष नहीं, सरस्वती उसकी बुद्धि हर ले गई थीं।

206.1

प्रमुदित तीरथराज-निवासी । बैषानस बटु गृही उदासी ॥
कहहिॅ परसपर मिलि दस पाँचा । भरत सनेह सीलु सुचि साँचा ॥

pramudita tīratharāja-nivāsī | baiṣānasa baṭu gṛhī udāsī ||
kahahiॅ parasapara mili dasa pām̐cā | bharata saneha sīlu suci sām̐cā ||

206.2

सुनत राम गुन ग्राम सुहाये । भरद्वाज मुनिबर पहिँ आये ॥
दंड प्रनाम करत मुनि देखे । मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ॥

sunata rāma guna grāma suhāye | bharadvāja munibara pahim̐ āye ||
daṃḍa pranāma karata muni dekhe | mūratimaṃta bhāgya nija lekhe ||

206.3

धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे । दीन्हि असीस कृतारथॅ कीन्हे ॥
आसन दीन्ह नाइ सिर बैठे । चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ॥

dhāi uṭhāi lāi ura līnhe | dīnhi asīsa kṛtārathaॅ kīnhe ||
āsana dīnha nāi sira baiṭhe | cahata sakuca gṛham̐ janu bhaji paiṭhe ||

206.4

मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू । बोले रिषि लखि सील सँकोचू ॥
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई । विधि करतब पर किछु न बसाई ॥

muni pūm̐chaba kachu yaha bar̤a socū | bole riṣi lakhi sīla sam̐kocū ||
sunahu bharata hama saba sudhi pāī | vidhi karataba para kichu na basāī ||

दो॰ 206दोहा

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु, समुझि मातु करतूति ।
तात कैकइहि दोष नहिँ, गई गिरा मति धूति ॥

tumha galāni jiyam̐ jani karahu, samujhi mātu karatūti |
tāta kaikaihi doṣa nahim̐, gaī girā mati dhūti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0