अयोध्याकाण्ड

अध्याय 204: त्रिवेणी पर भरत का एक ही वर

5 श्लोक · 204 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

त्रिवेणी पर भरत का एक ही वर

पैरों के छाले ऐसे झलकते हैं जैसे कमल की कली में ओस की बूँदें। भरत आज पैदल ही आए, यह सुनकर सारा समाज दुःखी हो जाता है। वे विधि से श्याम और श्वेत जल में स्नान करते हैं और दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। साँवली और उजली लहरें देखकर उनका शरीर पुलकित हो जाता है और वे हाथ जोड़ते हैं। हे तीर्थराज, आप सब कामनाएँ पूरी करने वाले हैं, आपका प्रभाव वेद में प्रसिद्ध और जगत में प्रकट है। मैं अपना धर्म छोड़कर भीख माँगता हूँ, आर्त मनुष्य कौन सा कुकर्म नहीं करता? मुझे न अर्थ की रुचि है, न धर्म की, न काम की, न मैं निर्वाण चाहता हूँ। जन्म जन्म राम के चरणों में प्रीति हो, बस यही वरदान, और कुछ नहीं।

204.1

झलका झलकत पायन्ह कैसे । पङ्कज-कोस ओस-कन जैसें ॥
भरत पयादेहिं आये आजू । भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥

jhalakā jhalakata pāyanha kaise | paṅkaja-kosa osa-kana jaiseṃ ||
bharata payādehiṃ āye ājū | bhayau dukhita suni sakala samājū ||

204.2

खबरि लीन्ह सब लोग नहाये । कीन्ह प्रनाम त्रिबेनिहिं आये ॥
सबिधि सितासित-नीर नहाने । दिये दान महिसुर सनमाने ॥

khabari līnha saba loga nahāye | kīnha pranāma tribenihiṃ āye ||
sabidhi sitāsita-nīra nahāne | diye dāna mahisura sanamāne ||

204.3

देखत स्यामल-धवल हलोरे । पुलकि सरीर भरत कर जोरे ॥
सकल काम-प्रद तीरथराऊ । बेद-बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥

dekhata syāmala-dhavala halore | pulaki sarīra bharata kara jore ||
sakala kāma-prada tīratharāū | beda-bidita jaga pragaṭa prabhāū ||

204.4

माँगउँ भीख त्यागि निज-धरमू । आरत काह न करइ कुकरमू ॥
अस जियँ जानि सुजान सुदानी । सफल करहिँ जग जाचक बानी ॥

mām̐gaum̐ bhīkha tyāgi nija-dharamū | ārata kāha na karai kukaramū ||
asa jiyam̐ jāni sujāna sudānī | saphala karahim̐ jaga jācaka bānī ||

दो॰ 204दोहा

अरथ न धरम न काम-रुचि, गति न चहउँ निरबान ।
जनम जनम रति राम-पद, यह बरदान न आन ॥

aratha na dharama na kāma-ruci, gati na cahaum̐ nirabāna |
janama janama rati rāma-pada, yaha baradāna na āna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0