अयोध्याकाण्ड

अध्याय 20: कैकेयी का काँपना और मन्थरा पर विश्वास

5 श्लोक · 20 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कैकेयी का काँपना और मन्थरा पर विश्वास

ये कड़वे वचन सुनकर कैकय की पुत्री कुछ कह नहीं पातीं, सहमकर सूख गईं। शरीर पसीने से भर गया और वे केले के पेड़ की तरह काँपने लगीं। कुबड़ी ने दाँतों तले जीभ दबा ली। करोड़ों कपट कथाएँ कहकर उसने धीरज बँधाया और ऐसा कुपाठ पढ़ाया कि वे सूखे टेढ़े काठ की तरह फिर न झुकें। भाग्य फिर गया, कुचाल प्रिय लगी, वे बगुली को हंसिनी मानकर सराहने लगीं। कैकेयी बोलीं, मन्थरा, तेरी बात सच है। मेरी दाहिनी आँख नित फड़कती है और रोज़ रात बुरे सपने आते हैं, पर मोहवश तुझसे नहीं कहा। सखी, क्या करूँ, मैं सीधी हूँ, दायाँ-बायाँ नहीं जानती। किसी का बुरा नहीं किया, फिर किस पाप से दैव ने यह दुःसह दुःख दिया?

20.1

कैकय-सुता सुनत कटु बानी । कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी ॥
तन पसेउ कदली जिमि काँपी । कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी ॥

kaikaya-sutā sunata kaṭu bānī | kahi na sakai kachu sahami sukhānī ||
tana paseu kadalī jimi kām̐pī | kubarīṃ dasana jībha taba cām̐pī ||

20.2

कहि कहि कोटिक कपट कहानी । धीरज धरहु प्रबोधिसि रानी ॥
फिरा करम प्रिय लागि कुचाली । बकिहि सराहइ मानि मराली ॥

kahi kahi koṭika kapaṭa kahānī | dhīraja dharahu prabodhisi rānī ||
phirā karama priya lāgi kucālī | bakihi sarāhai māni marālī ||

20.3

सुनु मन्थरा बात फुरि तोरी । दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी ॥
दिन प्रति देखउँ राति कुसपने । कहउँ न तोहि मोह बस अपने ॥

sunu mantharā bāta phuri torī | dahini ām̐khi nita pharakai morī ||
dina prati dekhaum̐ rāti kusapane | kahaum̐ na tohi moha basa apane ||

20.4

काह करउँ सखि सूध सुभाऊ । दाहिन बाम न जानउँ काऊ ॥

kāha karaum̐ sakhi sūdha subhāū | dāhina bāma na jānaum̐ kāū ||

दो॰ 20दोहा

अपने चलत न आजु लगि, अनमल काहु क कीन्ह ।
केहिं अघ एकहि बार मोहि, दइय दुसह दुख दीन्ह ॥

apane calata na āju lagi, anamala kāhu ka kīnha |
kehiṃ agha ekahi bāra mohi, daiya dusaha dukha dīnha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0