अयोध्याकाण्ड

अध्याय 193: गुह भेंट लाते हैं, भरत गले लगाते हैं

5 श्लोक · 193 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

गुह भेंट लाते हैं, भरत गले लगाते हैं

गुह विचार करते हैं, सुन्दर स्वभाव से स्नेह जान लूँगा, वैर और प्रीति छिपाए नहीं छिपते। यह कहकर वे भेंट सजाने लगते हैं, कन्द, मूल, फल, पक्षी और मृग मँगाते हैं, और कहार बड़ी बड़ी मछलियों के भार भरकर लाते हैं। दूर से ही अपना नाम कहकर वे मुनिराज को दंडवत प्रणाम करते हैं। उन्हें राम का प्रिय जानकर मुनि आशीर्वाद देते हैं और भरत को समझाकर बताते हैं। राम का सखा सुनते ही भरत रथ छोड़कर उतर पड़ते हैं और उमड़ते अनुराग से आगे बढ़ते हैं। गुह अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर धरती पर माथा टेककर प्रणाम करते हैं। उन्हें दंडवत करते देख भरत हृदय से लगा लेते हैं, मानो लक्ष्मण से भेंट हुई हो, प्रेम हृदय में नहीं समाता।

193.1

लखन सनेह सुभायँ सुहाये । बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराये ॥
अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कन्द मूल फल खग मृग मागे ॥

lakhana saneha subhāyam̐ suhāye | bairu prīti nahiṃ duraim̐ durāye ||
asa kahi bheṃṭa sam̐jovana lāge | kanda mūla phala khaga mṛga māge ||

193.2

मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥
मिलन साज सजि मिलन सिधाये । मङ्गल-मूल सगुन सुभ पाये ॥

mīna pīna pāṭhīna purāne | bhari bhari bhāra kahāranha āne ||
milana sāja saji milana sidhāye | maṅgala-mūla saguna subha pāye ||

193.3

देखि दूरि तेँ कहि निज नामू । कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ॥
जानि राम प्रिय दोन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ॥

dekhi dūri tem̐ kahi nija nāmū | kīnha munīsahi daṃḍa pranāmū ||
jāni rāma priya donhi asīsā | bharatahi kaheu bujhāi munīsā ||

193.4

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ॥
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहार माथ महि लाई ॥

rāma sakhā suni saṃdanu tyāgā | cale utari umagata anurāgā ||
gāum̐ jāti guham̐ nāum̐ sunāī | kīnha johāra mātha mahi lāī ||

दो॰ 193दोहा

करत दंडवत देखि तेहि, भरत लीन्ह उर लाइ ।
मनहुँ लखन सन भेँट भइ, प्रेम न हृदयँ समाइ ॥

karata daṃḍavata dekhi tehi, bharata līnha ura lāi |
manahum̐ lakhana sana bhem̐ṭa bhai, prema na hṛdayam̐ samāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0