अयोध्याकाण्ड

अध्याय 18: कौसल्या की चतुराई का आरोप

5 श्लोक · 18 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या की चतुराई का आरोप

मन्थरा आगे कहती है: श्रीराम की माता चतुर और गम्भीर हैं, अवसर पाकर उन्होंने अपनी बात बना ली। राजा ने भरत को ननिहाल भेजा, यह उन्हीं की सलाह समझो। वे सोचती हैं कि सब सौतें मेरी सेवा करती हैं, केवल भरत की माता पति के बल पर घमण्ड करती है। तुम ही कौसल्या के मन का काँटा हो, पर वे कपट में ऐसी चतुर हैं कि दिखता नहीं। राजा का तुम पर विशेष प्रेम है, सौत यह सह नहीं सकती, इसलिए जाल रचकर राजा को अपना बनाया और तिलक का लग्न धरवाया। श्रीराम का तिलक कुल के योग्य है, मुझे भी अच्छा लगता है, पर आगे का सोचकर डर लगता है। करोड़ों कुटिलताएँ गढ़कर उसने कपट पढ़ाया और सौतों की सैकड़ों कथाएँ सुनाईं जिससे विरोध बढ़े।

18.1

चतुर गँभीर राम-महँतारी । बीच पाइ निज बात सँवारी ॥
पठये भरत भूप ननिअउरें । राम-मातु मत जानब रउरें ॥

catura gam̐bhīra rāma-maham̐tārī | bīca pāi nija bāta sam̐vārī ||
paṭhaye bharata bhūpa naniaureṃ | rāma-mātu mata jānaba raureṃ ||

18.2

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत-मातु बल पी कें ॥
साल तुम्हार कौसिलहि माई । कपट चतुर नहिँ परइ जनाई ॥

sevahiṃ sakala savati mohi nīkeṃ | garabita bharata-mātu bala pī keṃ ||
sāla tumhāra kausilahi māī | kapaṭa catura nahim̐ parai janāī ||

18.3

राजहि तुम्ह पर प्रेम बिसेखी । सवति सुभाउ सकइ नहिँ देखी ॥
रचि प्रपञ्च भूपहि अपनाई । राम-तिलक-हित लगन धराई ॥

rājahi tumha para prema bisekhī | savati subhāu sakai nahim̐ dekhī ||
raci prapañca bhūpahi apanāī | rāma-tilaka-hita lagana dharāī ||

18.4

यह कुल उचित राम कहँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥
आगिल बात समुझि डर मोही । देउ दैव फिरि सो फल ओही ॥

yaha kula ucita rāma kaham̐ ṭīkā | sabahi sohāi mohi suṭhi nīkā ||
āgila bāta samujhi ḍara mohī | deu daiva phiri so phala ohī ||

दो॰ 18दोहा

रचि पचि कोटिक कुटिल-पन, कीन्हेसि कपट प्रबोध ।
कहिसि कथा सत सवति कै, जेहि विधि बाढ़ विरोध ॥

raci paci koṭika kuṭila-pana, kīnhesi kapaṭa prabodha |
kahisi kathā sata savati kai, jehi vidhi bār̤ha virodha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0