सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मृगी जनु मोही ॥
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥
sādara puni puni pūm̐chati ohī | sabarī gāna mṛgī janu mohī ||
tasi mati phirī ahai jasi bhābī | rahasī ceri ghāta janu phābī ||
5 श्लोक · 17 में से 326
अब कैकेयी आदर से बार-बार पूछने लगीं, मानो भीलनी के गान पर मोहित हिरनी हो। होनी के अनुसार उनकी बुद्धि फिर गई और दासी प्रसन्न हुई कि घात बैठ गया। मन्थरा बोली, तुम पूछती हो पर मैं कहते डरती हूँ, तुमने मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। फिर गढ़-छीलकर विश्वास जमाकर अवध की साढ़ेसाती बोली: श्रीराम को तुम प्रिय थीं, यह सच है, पर वे दिन बीत गए। समय फिरने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। सूर्य कमल को पालता है, पर जल बिना वही उसे राख कर देता है। सौत तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है, उपाय की बाड़ से उसे बचाओ। सुहाग के बल पर तुम राजा को अपने वश में मानती हो, पर वे मन के मैले और मुँह के मीठे हैं, और तुम सरल हो।
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मृगी जनु मोही ॥
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥
sādara puni puni pūm̐chati ohī | sabarī gāna mṛgī janu mohī ||
tasi mati phirī ahai jasi bhābī | rahasī ceri ghāta janu phābī ||
तुम्ह पूछहु मैँ कहत डेराऊँ । धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ ॥
सजि प्रतीति बहु-बिधि गढ़ि छोली । अवध साढ़साती तब बोली ॥
tumha pūchahu maim̐ kahata ḍerāūm̐ | dhareu mora gharaphorī nāūm̐ ||
saji pratīti bahu-bidhi gar̤hi cholī | avadha sār̤hasātī taba bolī ||
प्रिय सिय राम कहा तुम्ह रानी । रामहिँ तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥
रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिँ पिरीते ॥
priya siya rāma kahā tumha rānī | rāmahim̐ tumha priya so phuri bānī ||
rahā prathama aba te dina bīte | samau phireṃ ripu hohim̐ pirīte ||
भानु कमल-कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा ॥
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी । रुँधहु करि उपाउ बर बारी ॥
bhānu kamala-kula poṣanihārā | binu jala jāri karai soi chārā ||
jari tumhāri caha savati ukhārī | rum̐dhahu kari upāu bara bārī ||
तुम्हहिँ न सोच सोहाग बल, निज बस जानहु राउ ।
मन मलीन मुँह-मीठ नृप, राउर सरल सुभाउ ॥
tumhahim̐ na soca sohāga bala, nija basa jānahu rāu |
mana malīna mum̐ha-mīṭha nṛpa, rāura sarala subhāu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0