अयोध्याकाण्ड

अध्याय 165: कौसल्या भरत को राम मानकर धीरज देती हैं

5 श्लोक · 165 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या भरत को राम मानकर धीरज देती हैं

कौसल्या सहज स्वभाव से भरत को हृदय से लगाती हैं, मानो स्वयं श्रीराम लौट आए हों। फिर शत्रुघ्न से भी मिलती हैं, और हृदय में शोक और स्नेह समाता नहीं। यह देखकर सब कहते हैं कि राम की माता ऐसी क्यों न हों। माता भरत को गोद में बिठाकर आँसू पोंछती हैं और कोमल वचन कहती हैं। बेटा, धीरज धरो, बुरा समय जानकर शोक छोड़ो। मन में हानि और ग्लानि मत मानो, काल और कर्म की गति टलती नहीं। किसी को दोष मत दो, विधाता ही मुझसे उलटा हो गया है, जो इतने दुःख में भी मुझे जीवित रखे है। फिर वे बताती हैं कि पिता की आज्ञा से श्रीराम ने आभूषण त्यागकर वल्कल पहन लिए, मन में न विषाद था न हर्ष।

165.1

सरल सुभाय मायँ हियँ लाये । अति हित मनहुँ राम फिरि आये ॥
भेंटेउ बहुरि लखन-लघु-भाई । सोक-सनेह न हृदयँ समाई ॥

sarala subhāya māyam̐ hiyam̐ lāye | ati hita manahum̐ rāma phiri āye ||
bheṃṭeu bahuri lakhana-laghu-bhāī | soka-saneha na hṛdayam̐ samāī ||

165.2

देखि सुभाउ कहत सब कोई । राम-मातु अस काहे न होई ॥
माताँ भरत गोद बैठारे । आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे ॥

dekhi subhāu kahata saba koī | rāma-mātu asa kāhe na hoī ||
mātām̐ bharata goda baiṭhāre | ām̐su pauṃchi mṛdu bacana ucāre ||

165.3

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥
जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल-करम-गति अघटित जानी ॥

ajahum̐ baccha bali dhīraja dharahū | kusamau samujhi soka pariharahū ||
jani mānahu hiyam̐ hāni galānī | kāla-karama-gati aghaṭita jānī ||

165.4

काहुहि दोस देहु जनि ताता । भा मोहि सब विधि बाम बिधाता ॥
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा । अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥

kāhuhi dosa dehu jani tātā | bhā mohi saba vidhi bāma bidhātā ||
jo etehum̐ dukha mohi jiāvā | ajahum̐ ko jānai kā tehi bhāvā ||

दो॰ 165दोहा

पितु आयसु भूषन बसन, तात तजे रघुबीर ।
बिसमउ हरष न हृदयँ कछु, पहिरे बलकल चीर ॥

pitu āyasu bhūṣana basana, tāta taje raghubīra |
bisamau haraṣa na hṛdayam̐ kachu, pahire balakala cīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0