अयोध्याकाण्ड

अध्याय 153: नाव पार गई, दशरथ गिर पड़े

5 श्लोक · 153 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

नाव पार गई, दशरथ गिर पड़े

सुमन्त्र वृत्तान्त समाप्त करते हैं: रघुवर का संकेत पाकर केवट ने नाव चला दी, रघुकुलतिलक चले गए और मैं छाती पर वज्र रखे खड़ा देखता रहा। अपना क्लेश क्या कहूँ, राम का सन्देश लेकर जीवित लौट आया। इतना कहकर मन्त्री ग्लानि के वश चुप हो गए। पुत्र के वचन सुनते ही राजा धरती पर गिर पड़े, हृदय में दारुण जलन है; वे भयंकर मूर्च्छा में ऐसे तड़पते हैं मानो मछली को माँजा लग गया हो। सब रानियाँ विलाप करके रोती हैं; वह विलाप सुनकर दुःख को भी दुःख लगा और धीरज का भी धीरज भाग गया। दोहे में राजमहल का शोर सुनकर अवध में भारी कोलाहल मच गया, मानो रात में पक्षियों से भरे वन पर कठोर वज्र गिरा हो।

153.1

तेहि अवसर रघुबर-रुख पाई । केवट पारहि नाव चलाई ॥
रघुकुल-तिलक चले एहि भाँती । देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ॥

tehi avasara raghubara-rukha pāī | kevaṭa pārahi nāva calāī ||
raghukula-tilaka cale ehi bhām̐tī | dekhaum̐ ṭhār̤ha kulisa dhari chātī ||

153.2

मैं आपन किमि कहउँ कलेसू । जियत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू ॥
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ । हानि-गलानि-सोच-बस भयऊ ॥

maiṃ āpana kimi kahaum̐ kalesū | jiyata phireum̐ lei rāma sam̐desū ||
asa kahi saciva bacana rahi gayaū | hāni-galāni-soca-basa bhayaū ||

153.3

सुत बचन सुनतहिं नरनाहू । परेउ-धरनि उर दारुन दाहू ॥
तलफत बिषम-मोह मन मापा । माजा मनहुँ मीन कहँ ब्यापा ॥

suta bacana sunatahiṃ naranāhū | pareu-dharani ura dāruna dāhū ||
talaphata biṣama-moha mana māpā | mājā manahum̐ mīna kaham̐ byāpā ||

153.4

करि बिलाप सब रोवहिं रानी । महा बिपति किमि जाइ बखानी ॥
सुनि बिलाप दुखहू दुख लागा । धीरजहू कर धीरज भागा ॥

kari bilāpa saba rovahiṃ rānī | mahā bipati kimi jāi bakhānī ||
suni bilāpa dukhahū dukha lāgā | dhīrajahū kara dhīraja bhāgā ||

दो॰ 153दोहा

भयउ कोलाहल अवध अति, सुनि नृप-राउर सोरु ।
बिपुल बिहँग-बन परेउ निसि, मानहुँ कुलिस कठोर ॥

bhayau kolāhala avadha ati, suni nṛpa-rāura soru |
bipula biham̐ga-bana pareu nisi, mānahum̐ kulisa kaṭhora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0