अयोध्याकाण्ड

अध्याय 150: सुमन्त्र का धैर्य का उपदेश और वृत्तान्त

5 श्लोक · 150 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सुमन्त्र का धैर्य का उपदेश और वृत्तान्त

राजा बार बार पुत्रों का सन्देश पूछते हैं और कहते हैं, सखा, वही उपाय करो जिससे राम, लक्ष्मण और सीता को आँखों से दिखा सको। तब मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी में कहते हैं, महाराज, आप ज्ञानी हैं, धीरों में श्रेष्ठ हैं, आपने सदा साधुसमाज की सेवा की है। जन्म और मरण, दुःख और भोग, हानि और लाभ, मिलना और बिछुड़ना, ये सब काल और कर्म के वश होते हैं, रात और दिन की भाँति बरबस। मूर्ख सुख में हर्षित और दुःख में विलाप करते हैं, धीर दोनों को समान मानते हैं। विवेक से धीरज धरिए और शोक छोड़िए। दोहे में वे वृत्तान्त आरम्भ करते हैं: पहला पड़ाव तमसा पर हुआ, दूसरा गंगा के तट पर, जहाँ सीता सहित दोनों वीरों ने स्नान करके केवल जल पिया।

150.1

पुनि पुनि पूछत मंत्रहि राऊ । प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ ॥
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ । राम-लखन-सिय नयन देखाऊ ॥

puni puni pūchata maṃtrahi rāū | priyatama suana sam̐desa sunāū ||
karahi sakhā soi begi upāū | rāma-lakhana-siya nayana dekhāū ||

150.2

सचिव धीर धरि कह मृदु बानी । महाराज तुम्ह पंडित ज्ञानी ॥
बीर सुधीर-धुरन्धर देवा । साधु-समाज सदा तुम्ह सेवा ॥

saciva dhīra dhari kaha mṛdu bānī | mahārāja tumha paṃḍita jñānī ||
bīra sudhīra-dhurandhara devā | sādhu-samāja sadā tumha sevā ||

150.3

जनम मरन सब दुख-भोगा । हानि लाभ प्रिय-मिलन बियोगा ॥
काल-करम बस होहिं गोसाँई । बरबस राति दिवस की नाँई ॥

janama marana saba dukha-bhogā | hāni lābha priya-milana biyogā ||
kāla-karama basa hohiṃ gosām̐ī | barabasa rāti divasa kī nām̐ī ||

150.4

सुख हरषहिँ जड़ दुख बिलखाहीं । दोउ सम धीर धरहिँ मन माहीं ॥
धीरज धरहु बिबेक बिचारी । छाड़िअ सोच सकल-हितकारी ॥

sukha haraṣahim̐ jar̤a dukha bilakhāhīṃ | dou sama dhīra dharahim̐ mana māhīṃ ||
dhīraja dharahu bibeka bicārī | chār̤ia soca sakala-hitakārī ||

दो॰ 150दोहा

प्रथम बास तमसा भयउ, दूसर सुरसरि तीर ।
न्हाइ रहे जलपान करि, सिय समेत दोउ बीर ॥

prathama bāsa tamasā bhayau, dūsara surasari tīra |
nhāi rahe jalapāna kari, siya sameta dou bīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0