अयोध्याकाण्ड

अध्याय 143: शोक से भरा रथ अवध की ओर

5 श्लोक · 143 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

शोक से भरा रथ अवध की ओर

धीरज धरकर निषाद कहता है, सुमन्त्रजी, विषाद छोड़िए; आप पण्डित और परमार्थ के ज्ञाता हैं, विधाता को विपरीत देखकर धैर्य रखिए। कोमल वाणी में समझाकर वह उन्हें बरबस रथ पर बैठाता है। पर शोक से शिथिल सुमन्त्र रथ नहीं हाँक पाते। घोड़े छटपटाते हैं, मानो वन के हिरन रथ में जोते गए हों; ठोकर खाकर गिरते हैं और मुड़ मुड़कर पीछे देखते हैं। जो कोई राम, लक्ष्मण या वैदेही का नाम लेता है, उसी की ओर हिनहिनाकर देखते हैं। उनकी दशा मणि खोए साँप जैसी है। दोहे में यह देखकर निषाद शोक के वश हो गया और चार अच्छे सेवक सारथी बनाकर साथ भेज दिए।

143.1

धरि धीरज तब कहइ निषादू । अब सुमन्त्र परिहरहु बिषादू ॥
तुम्ह पंडित परमारथ-ज्ञाता । धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता ॥

dhari dhīraja taba kahai niṣādū | aba sumantra pariharahu biṣādū ||
tumha paṃḍita paramāratha-jñātā | dharahu dhīra lakhi bimukha bidhātā ||

143.2

विविध कथा कहि कहि मृदु बानी । रथ बैठारेउ बरबस आनी ॥
सोक-सिथिल रथ सकइ न हाँकी । रघुबर-बिरह-पीर उर बाँकी ॥

vividha kathā kahi kahi mṛdu bānī | ratha baiṭhāreu barabasa ānī ||
soka-sithila ratha sakai na hām̐kī | raghubara-biraha-pīra ura bām̐kī ||

143.3

चरफराहिँ मग चलहिँ न घोरे । बन-मृग मनहुँ आनि रथ जोरे ॥
अढ़ुकि परहिँ फिरि हेरहिं पीछें । राम-बियोग बिकल दुख तीछें ॥

carapharāhim̐ maga calahim̐ na ghore | bana-mṛga manahum̐ āni ratha jore ||
ar̤huki parahim̐ phiri herahiṃ pīcheṃ | rāma-biyoga bikala dukha tīcheṃ ||

143.4

जो कह राम लखन बैदेही । हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही ॥
बाजि-बिरह-गति कहि किमि जाती । बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती ॥

jo kaha rāma lakhana baidehī | hiṃkari hiṃkari hita herahiṃ tehī ||
bāji-biraha-gati kahi kimi jātī | binu mani phanika bikala jehi bhām̐tī ||

दो॰ 143दोहा

भयउ निषाद बिषाद-बस, देखत सचिव तुरङ्ग ।
बोलि सुसेवक चारि तब, दिये सारथी सङ्ग ॥

bhayau niṣāda biṣāda-basa, dekhata saciva turaṅga |
boli susevaka cāri taba, diye sārathī saṅga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0