अयोध्याकाण्ड

अध्याय 121: स्त्रियों की कामना, मार्ग फूलों का होता

5 श्लोक · 121 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

स्त्रियों की कामना, मार्ग फूलों का होता

स्त्रियाँ स्नेह से ऐसी विकल हो जाती हैं जैसे साँझ के समय चकवी। कोमल चरणकमलों और कठिन मार्ग को जानकर वे भरे हृदय से सुन्दर वचन कहती हैं। इन कोमल, लाल चरणों को छूते ही पृथ्वी ऐसे सकुचाती है जैसे हमारे हृदय। यदि जगदीश ने इन्हें वन दिया तो मार्ग फूलों का क्यों न बना दिया? हे सखी, यदि विधाता से माँगा मिले तो इन्हें आँखों में रख लें। जो समय पर नहीं आए, वे अकुलाकर पूछते हैं कि वे कहाँ तक गए होंगे। जो समर्थ हैं वे दौड़कर जाकर देखते हैं और जन्म का फल पाकर प्रसन्न लौटते हैं। अबला, बालक और बूढ़े हाथ मलकर पछताते हैं। इस प्रकार राम जहाँ जहाँ जाते हैं, लोग प्रेम के वश हो जाते हैं।

121.1

नारि सनेह बिकल बस होहीँ । चकई साँझ समय जनु सोहीं ॥
मृदु पद-कमल कठिन मग जानी । गहबरि हृदयँ कहहिँ बर बानी ॥

nāri saneha bikala basa hohīm̐ | cakaī sām̐jha samaya janu sohīṃ ||
mṛdu pada-kamala kaṭhina maga jānī | gahabari hṛdayam̐ kahahim̐ bara bānī ||

121.2

परसत मृदुल-चरन अरुनारे । सकुचति महि जिमि हृदय हमारे ॥
जौँ जगदीस इन्हहि बन दीन्हा । कस न सुमन-मयमारग कीन्हा ॥

parasata mṛdula-carana arunāre | sakucati mahi jimi hṛdaya hamāre ||
jaum̐ jagadīsa inhahi bana dīnhā | kasa na sumana-mayamāraga kīnhā ||

121.3

जौँ माँगा पाइअ बिधि पाहीँ । ये रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीँ ॥
जे नर नारि न अवसर आये । तिन्ह सिय राम न देखन पाये ॥

jaum̐ mām̐gā pāia bidhi pāhīm̐ | ye rakhiahiṃ sakhi ām̐khinha māhīm̐ ||
je nara nāri na avasara āye | tinha siya rāma na dekhana pāye ||

121.4

सुनि सुरूप बूझहिँ अकुलाई । अब लगि गये कहाँ लगि भाई ॥
समरथ धाइ बिलोकहिँ जाई । प्रमुदित फिरहिँ जनम फल पाई ॥

suni surūpa būjhahim̐ akulāī | aba lagi gaye kahām̐ lagi bhāī ||
samaratha dhāi bilokahim̐ jāī | pramudita phirahim̐ janama phala pāī ||

दो॰ 121दोहा

अबला-बालक-बृद्ध जन, कर मीजहिं पछिताहिँ ।
होहिँ प्रेम-बस लोग इमि, राम जहाँ जहँ जाहिँ ॥

abalā-bālaka-bṛddha jana, kara mījahiṃ pachitāhim̐ |
hohim̐ prema-basa loga imi, rāma jahām̐ jaham̐ jāhim̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0