अयोध्याकाण्ड

अध्याय 111: तापस से मिलन और गुह की विदाई

5 श्लोक · 111 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

तापस से मिलन और गुह की विदाई

श्रीराम ने प्रेम से पुलकित होकर तापस को हृदय से लगा लिया, मानो परम दरिद्र को पारस मिल गया हो। सब कहते हैं मानो प्रेम और परमार्थ दोनों शरीर धरकर मिल रहे हों। लक्ष्मण के पाँव लगने पर उन्होंने उसे प्रेम से उठा लिया। फिर उसने सीता के चरणों की धूल सिर पर धरी, और माता सीता ने उसे बालक जानकर आशीर्वाद दिया। निषाद ने उसे दण्डवत किया, और राम का प्रेमी जानकर वह प्रसन्न होकर गुह से मिला। वह आँखों के दोनों से रूप का अमृत पीता है, जैसे भूखा अच्छा भोजन पाकर प्रसन्न हो। तब रघुवीर ने सखा गुह को अनेक प्रकार से सीख दी, और वह राम की आज्ञा सिर धरकर घर लौट गया।

111.1

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रङ्क जनु पारस पावा ॥
मनहुँ प्रेम परमारथ दोऊ । मिलत धरे तन कह सब कोऊ ॥

rāma saprema pulaki ura lāvā | parama raṅka janu pārasa pāvā ||
manahum̐ prema paramāratha doū | milata dhare tana kaha saba koū ||

111.2

बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा । लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा ॥
पुनि सिय-चरन-धूरि धरि सीसा । जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा ॥

bahuri lakhana pāyanha soi lāgā | līnha uṭhāi umagi anurāgā ||
puni siya-carana-dhūri dhari sīsā | janani jāni sisu dīnhi asīsā ||

111.3

कीन्ह निषाद दंडवत तेही । मिलेउ मुदित लखि राम-सनेही ॥
पिअत नयन-पुट रूप-पियूखा । मुदित सुअसन पाइ जिमि भूखा ॥

kīnha niṣāda daṃḍavata tehī | mileu mudita lakhi rāma-sanehī ||
piata nayana-puṭa rūpa-piyūkhā | mudita suasana pāi jimi bhūkhā ||

111.4

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठये बन बालक ऐसे ॥
राम-लखन-सिय रूप निहारी । होहिं सनेह बिकल नर-नारी ॥

te pitu mātu kahahu sakhi kaise | jinha paṭhaye bana bālaka aise ||
rāma-lakhana-siya rūpa nihārī | hohiṃ saneha bikala nara-nārī ||

दो॰ 111दोहा

तब रघुबीर अनेक विधि, सखहि सिखावन दीन्ह ।
राम-रजायसु सीस धरि, भवन गवन तेंइँ कीन्ह ॥

taba raghubīra aneka vidhi, sakhahi sikhāvana dīnha |
rāma-rajāyasu sīsa dhari, bhavana gavana teṃim̐ kīnha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0