अयोध्याकाण्ड

अध्याय 110: यमुना तट के ग्रामवासी और एक तापस

5 श्लोक · 110 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

यमुना तट के ग्रामवासी और एक तापस

यह सुनकर तट के निवासी नर नारी अपने अपने काम भूलकर दौड़े। लक्ष्मण, राम और सीता की सुन्दरता देखकर वे अपने भाग्य की बड़ाई करते हैं। नाम गाँव पूछने में वे सकुचाते हैं। उनमें जो बड़े बूढ़े और समझदार थे, उन्होंने युक्ति से राम को पहचान लिया और सबको सारी कथा सुनाई कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन को जा रहे हैं। सुनकर सब विषाद से पछताने लगे कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया। उसी समय एक तापस आया, तेजस्वी, वैरागी वेश वाला और मन, कर्म, वचन से राम का अनुरागी। अपने इष्टदेव को पहचानकर, आँखों में जल भरे और पुलकित शरीर से, वह दण्ड की तरह भूमि पर गिर पड़ा, उसकी दशा कही नहीं जाती।

110.1

सुनत तीर-बासी नर-नारी । धाये निज निज काज बिसारी ॥
लखन-राम-सिय सुन्दरताई । देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥

sunata tīra-bāsī nara-nārī | dhāye nija nija kāja bisārī ||
lakhana-rāma-siya sundaratāī | dekhi karahiṃ nija bhāgya bar̤āī ||

110.2

अति लालसा सबहि मन माहीं । नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीँ ॥
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने । तिन्ह करि जुगुति राम पहिचाने ॥

ati lālasā sabahi mana māhīṃ | nāum̐ gāum̐ būjhata sakucāhīm̐ ||
je tinha mahum̐ bayabiridha sayāne | tinha kari juguti rāma pahicāne ||

110.3

सकल कथा तिन्ह सबहिँ सुनाई । बनहिँ चले पितु आयसु पाई ॥
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीँ । रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥

sakala kathā tinha sabahim̐ sunāī | banahim̐ cale pitu āyasu pāī ||
suni sabiṣāda sakala pachitāhīm̐ | rānī rāyam̐ kīnha bhala nāhīṃ ||

110.4

तेहि अवसर एक तापस आवा । तेजपुंज लघुबयस सुहावा ॥
कबि-अलखित-गति बेष बिरागी । मन क्रम बचन राम-अनुरागी ॥

tehi avasara eka tāpasa āvā | tejapuṃja laghubayasa suhāvā ||
kabi-alakhita-gati beṣa birāgī | mana krama bacana rāma-anurāgī ||

दो॰ 110दोहा

सजल नयन तन पुलकि निज, इष्टदेउ पहिचानि ।
परेउ दंड जिमि धरनितल, दसा न जाइ बखानि ॥

sajala nayana tana pulaki nija, iṣṭadeu pahicāni |
pareu daṃḍa jimi dharanitala, dasā na jāi bakhāni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0