अयोध्याकाण्ड

अध्याय 109: मुनि शिष्यों के साथ यमुना तक

5 श्लोक · 109 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

मुनि शिष्यों के साथ यमुना तक

श्रीराम ने प्रेम से मुनि से पूछा, हे नाथ, कहिए हम किस मार्ग से जाएँ। मुनि मन में हँसकर बोले, आपके लिए सभी मार्ग सुगम हैं। उन्होंने साथ जाने के लिए शिष्यों को बुलाया, लगभग पचास प्रसन्न होकर आए, सब कहते थे कि हमने मार्ग देखा है। तब मुनि ने चार ब्रह्मचारी साथ दिए, जिन्होंने बहुत जन्मों में पुण्य किए थे। प्रणाम कर ऋषि की आज्ञा पाकर रघुराई प्रसन्न हृदय से चले। जब वे किसी गाँव के पास से निकलते, नर नारी दौड़कर दर्शन करते, जन्म का फल पाकर सनाथ होते, और साथ विदा करके दुखी मन से लौटते। श्रीराम ने विनती करके ब्रह्मचारियों को विदा किया, वे मनोकामना पाकर लौटे। फिर प्रभु ने उतरकर यमुना के जल में स्नान किया, जो उनके शरीर के समान श्याम है।

109.1

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीँ । नाथ कहिय हम केहि मग जाहीँ ॥
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं । सुगम सकल मग तुम्ह कहँ अहहीं ॥

rāma saprema kaheu muni pāhīm̐ | nātha kahiya hama kehi maga jāhīm̐ ||
muni mana bihasi rāma sana kahahīṃ | sugama sakala maga tumha kaham̐ ahahīṃ ||

109.2

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाये । सुनि मन मुदित पचासक आये ॥
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा । सकल कहहिँ मग दीख हमारा ॥

sātha lāgi muni siṣya bolāye | suni mana mudita pacāsaka āye ||
sabanhi rāma para prema apārā | sakala kahahim̐ maga dīkha hamārā ||

109.3

मुनि बटु चारि सङ्ग तब दीन्हे । जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥
करि प्रनाम रिषि-आयसु पाई । प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥

muni baṭu cāri saṅga taba dīnhe | jinha bahu janama sukṛta saba kīnhe ||
kari pranāma riṣi-āyasu pāī | pramudita hṛdayam̐ cale raghurāī ||

109.4

ग्राम निकट जब निकसहिं जाई । देखहि दरस नारि-नर धाई ॥
होहि सनाथ जनम-फल पाई । फिरहि दुखित मन सङ्ग पठाई ॥

grāma nikaṭa jaba nikasahiṃ jāī | dekhahi darasa nāri-nara dhāī ||
hohi sanātha janama-phala pāī | phirahi dukhita mana saṅga paṭhāī ||

दो॰ 109दोहा

बिदा किये बटु बिनय करि, फिरे पाइ मन काम ।
उतरि नहाये जमुन-जल, जो सरीर सम स्याम ॥

bidā kiye baṭu binaya kari, phire pāi mana kāma |
utari nahāye jamuna-jala, jo sarīra sama syāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0