अरण्यकाण्ड

अध्याय 6: श्रीराम की विदा पर अत्रि के आँसू

8 श्लोक · 6 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम की विदा पर अत्रि के आँसू

उपदेश सुनकर जानकी परम सुखी होती हैं और अनसूया के चरणों में सिर नवाती हैं। तब श्रीराम मुनि से दूसरे वन जाने की आज्ञा माँगते हैं। ज्ञानी अत्रि प्रेम से कहते हैं: जिनकी कृपा ब्रह्मा, शिव और सनकादि चाहते हैं, वही आप मुझसे ऐसे दीन वचन कहते हैं। अब समझा कि लक्ष्मी ने सब देवों को छोड़कर आपको ही क्यों भजा। मैं कैसे कहूँ कि जाइए? आप अन्तर्यामी हैं। प्रभु को निहारते मुनि के नेत्रों से जल बहता है, शरीर पुलकित है। तुलसीदास कहते हैं कि जप, योग और धर्म से परे यह अनुपम भक्ति है, और इस कठिन कलियुग में चतुर वही है जो सब भरोसा छोड़कर राम को भजता है।

6.1

सुनि जानकीं परम सुख पावा । सादर तासु चरन सिर नावा ॥
तब मुनि सन कह कृपानिधाना । आयसु होइ जाउँ बन आना ॥

suni jānakīṃ parama sukha pāvā | sādara tāsu carana sira nāvā ||
taba muni sana kaha kṛpānidhānā | āyasu hoi jāum̐ bana ānā ||

6.2

सन्तत मो पर कृपा करेहू । सेवक जानि तजेहु जनि नेहू ॥
धरम-धुरन्धर प्रभु कै बानी । सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी ॥

santata mo para kṛpā karehū | sevaka jāni tajehu jani nehū ||
dharama-dhurandhara prabhu kai bānī | suni saprema bole muni gyānī ||

6.3

जासु कृपा अज सिव सनकादी । चहत परमारथबादी ॥
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे । दीन बन्धु मृदु बचन उचारे ॥

jāsu kṛpā aja siva sanakādī | cahata paramārathabādī ||
te tumha rāma akāma piāre | dīna bandhu mṛdu bacana ucāre ||

6.4

अब जानी में श्री चतुराई । भजी तुम्हहिं सब देव बिहाई ॥
जेहि समान अतिसय नहिँ कोई । ता कर सील कस न अस होई ॥

aba jānī meṃ śrī caturāī | bhajī tumhahiṃ saba deva bihāī ||
jehi samāna atisaya nahim̐ koī | tā kara sīla kasa na asa hoī ||

6.5

केहि बिधि कहउँ जाहु अब स्वामी । कहहु नाथ तुम्ह अन्तरजामी ॥
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा । लोचन जल बह पुलक सरीरा ॥

kehi bidhi kahaum̐ jāhu aba svāmī | kahahu nātha tumha antarajāmī ||
asa kahi prabhu biloki muni dhīrā | locana jala baha pulaka sarīrā ||

6.छं॰ 1छन्द

तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन, नयन मुख-पङ्कज दिये ।
मन-ज्ञान-गुन-गोतीत प्रभु में, दीख जप तप का किये ॥
जप जोग धरम-समूह तेँ नर, भगति अनुपम पावई ।
रधुबीर-चरित पुनीत निसि दिन, दास तुलसी गावई ॥

tana pulaka nirbhara prema pūrana, nayana mukha-paṅkaja diye |
mana-jñāna-guna-gotīta prabhu meṃ, dīkha japa tapa kā kiye ||
japa joga dharama-samūha tem̐ nara, bhagati anupama pāvaī |
radhubīra-carita punīta nisi dina, dāsa tulasī gāvaī ||

दो॰ 6 (क)दोहा

कलिमल समन दमन दुख, राम सुजस सुखमूल ।
सादर सुनहि जे तिन्ह पर, राम रहहिं अनुकूल ॥

kalimala samana damana dukha, rāma sujasa sukhamūla |
sādara sunahi je tinha para, rāma rahahiṃ anukūla ||

6.सो॰ 6 (ख)सोरठा

कठिन काल मल-कोस, धरम न ज्ञान न जोग जप ।
परिहरि सकल भरोस, रामहि भजहिँ ते चतुर नर ॥

kaṭhina kāla mala-kosa, dharama na jñāna na joga japa |
parihari sakala bharosa, rāmahi bhajahim̐ te catura nara ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0