सुनु मुनि कह पुरान श्रुति सन्ता । मोह विपिन कहँ नारि बसन्ता ॥
जप तप नेम जलाश्रय भारी । होइ ग्रीषम सोखइ सब नारी ॥
sunu muni kaha purāna śruti santā | moha vipina kaham̐ nāri basantā ||
japa tapa nema jalāśraya bhārī | hoi grīṣama sokhai saba nārī ||
5 श्लोक · 44 में से 46
राम आगे कहते हैं कि पुराण, वेद और सन्त ऐसा कहते हैं, और पाठ ऋतुओं के रूपक से अपना मत स्पष्ट रखता है। मोह-रूपी वन के लिए नारी वसन्त है। जप, तप और नियम-रूपी बड़े जलाशयों को सोखने वाली वह ग्रीष्म है। काम, क्रोध, मद और मत्सर-रूपी मेंढकों को हर्षित करने वाली वह वर्षा है, और दुर्वासना-रूपी कुमुदों को सुख देने वाली शरद। धर्म-रूपी कमलों के लिए वह पाला है, और ममता-रूपी जवासा उसी शिशिर में पनपता है। बुद्धि, बल, शील और सत्य-रूपी मछलियों के लिए प्रवीण लोग उसे बंसी का काँटा कहते हैं। राम नारद से कहते हैं कि युवती अवगुणों की जड़, पीड़ा देने वाली और सब दुखों की खान है; मुनि, यही जानकर मैंने तुम्हें विवाह से रोका।
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति सन्ता । मोह विपिन कहँ नारि बसन्ता ॥
जप तप नेम जलाश्रय भारी । होइ ग्रीषम सोखइ सब नारी ॥
sunu muni kaha purāna śruti santā | moha vipina kaham̐ nāri basantā ||
japa tapa nema jalāśraya bhārī | hoi grīṣama sokhai saba nārī ||
काम क्रोध मद मत्सर भेका । इन्हहिँ हरषप्रद बरषा एका ॥
दुर्वासना कुमुद समुदाई । तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई ॥
kāma krodha mada matsara bhekā | inhahim̐ haraṣaprada baraṣā ekā ||
durvāsanā kumuda samudāī | tinha kaham̐ sarada sadā sukhadāī ||
धर्म सकल सरसीरुह बृन्दा । होइ हिम तिन्हहिँ देति सुख-मन्दा ॥
पुनि ममता जवास बहुताई । पलुहइ नारि सिसिर-रितु पाई ॥
dharma sakala sarasīruha bṛndā | hoi hima tinhahim̐ deti sukha-mandā ||
puni mamatā javāsa bahutāī | paluhai nāri sisira-ritu pāī ||
पाप उलूक निकर सुखकारी । नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी ॥
बुधि बल सील सत्य सब मीना । बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना ॥
pāpa ulūka nikara sukhakārī | nāri nibir̤a rajanī am̐dhiārī ||
budhi bala sīla satya saba mīnā | banasī sama triya kahahiṃ prabīnā ||
अवगुन मूल सूलप्रद, प्रमदा सब दुख खानि ।
ताते कीन्ह निवारन, मुनि मैं यह जियँ जानि ॥
avaguna mūla sūlaprada, pramadā saba dukha khāni |
tāte kīnha nivārana, muni maiṃ yaha jiyam̐ jāni ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0