अरण्यकाण्ड

अध्याय 39: शिवजी का अनुभव और पम्पा सरोवर

6 श्लोक · 39 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

शिवजी का अनुभव और पम्पा सरोवर

शिवजी उमा से कहते हैं: राम गुणों से परे, चराचर के स्वामी और सबके अन्तर्यामी हैं। इस वार्ता से उन्होंने कामियों की दीनता दिखाई और धीरों के मन का वैराग्य दृढ़ किया। क्रोध, काम, लोभ, मद और माया सब राम की दया से छूटते हैं; जिस पर नट प्रसन्न हो, वह उसके इन्द्रजाल में नहीं भूलता। उमा, मैं अपना अनुभव कहता हूँ: हरि का भजन सत्य है, सारा जगत स्वप्न है। फिर प्रभु पम्पा नाम के सुन्दर, गहरे सरोवर के तट पर गए, जिसका निर्मल जल सन्तों के हृदय-सा है। घनी पुरइन की ओट में छिपा जल माया से ढके निर्गुण ब्रह्म-सा है, और अथाह जल में सुखी मछलियाँ धर्मशील लोगों के सुख भरे दिनों जैसी हैं।

39.1

गुनातीत सचराचर-स्वामी । राम उमा सब अन्तरजामी ॥
कामिन्ह के दीनता देखाई । धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई ॥

gunātīta sacarācara-svāmī | rāma umā saba antarajāmī ||
kāminha ke dīnatā dekhāī | dhīranha keṃ mana birati dṛr̤hāī ||

39.2

क्रोध मनोज लोभ मद माया । छूटहिँ सकल राम कीं दाया ॥
सो नर इन्द्रजाल नहिं भूला । जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥

krodha manoja lobha mada māyā | chūṭahim̐ sakala rāma kīṃ dāyā ||
so nara indrajāla nahiṃ bhūlā | jā para hoi so naṭa anukūlā ||

39.3

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥
पुनि प्रभु गये सरोबर तीरा । पम्पा नाम सुभग गम्भीरा ॥

umā kahaum̐ maiṃ anubhava apanā | sata hari bhajanu jagata saba sapanā ||
puni prabhu gaye sarobara tīrā | pampā nāma subhaga gambhīrā ||

39.4

सन्त हृदय जल निर्मल बारी । बाँधे घाट मनोहर चारी ॥
जहँ तहँ पिअहिं विविध मृग नीरा । जनु उदार-गृह जाचक भीरा ॥

santa hṛdaya jala nirmala bārī | bām̐dhe ghāṭa manohara cārī ||
jaham̐ taham̐ piahiṃ vividha mṛga nīrā | janu udāra-gṛha jācaka bhīrā ||

दो॰ 39 (क)दोहा

पुरइनि सघन ओट जल, बेगि न पाइअ मर्म ।
मायाछन्न न देखिऐ, जैसे निर्गुन ब्रह्म ॥

puraini saghana oṭa jala, begi na pāia marma |
māyāchanna na dekhiai, jaise nirguna brahma ||

दो॰ 39 (ख)दोहा

सुखी मीन सब एकरस, अति अगाध जल माहिँ ।
जथा धर्म-सीलन्ह के, दिन सुख-संजुत जाहिँ ॥

sukhī mīna saba ekarasa, ati agādha jala māhim̐ |
jathā dharma-sīlanha ke, dina sukha-saṃjuta jāhim̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0