अरण्यकाण्ड

अध्याय 37: वसन्त के वन में श्रीराम का विरह

7 श्लोक · 37 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

वसन्त के वन में श्रीराम का विरह

राम उस वन को भी छोड़कर चले। प्रभु विरही की भाँति विषाद करते और अनेक बातें कहते हैं: लक्ष्मण, वन की शोभा देखो, इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध न होगा? सब पक्षी और मृग अपनी संगिनी के साथ हैं, मानो मेरी निन्दा करते हैं। हमें देखकर मृग भागते हैं और मृगियाँ कहती हैं: तुम्हें डर नहीं, ये सोने का मृग खोजने आए हैं। भली-भाँति चिन्तन किया हुआ शास्त्र भी बार-बार देखना चाहिए, भली-भाँति सेवित राजा को भी वश में न समझे, और स्त्री को हृदय में रखकर भी वश में न माने; पाठ के अनुसार युवती, शास्त्र और राजा किसी के वश नहीं होते। भाई, देखो वसन्त कितना सुहावना है; प्रिया के बिना यह मुझे भय देता है।

37.1

चले राम त्यागा बन सोऊ । अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा । कहत कथा अनेक संबादा ॥

cale rāma tyāgā bana soū | atulita bala nara kehari doū ||
birahī iva prabhu karata biṣādā | kahata kathā aneka saṃbādā ||

37.2

लछिमन देखु विपिन कै सोभा । देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥
नारि सहित सब खग-मृग-बृन्दा । मानहुँ मोरि करत हहिँ निन्दा ॥

lachimana dekhu vipina kai sobhā | dekhata kehi kara mana nahiṃ chobhā ||
nāri sahita saba khaga-mṛga-bṛndā | mānahum̐ mori karata hahim̐ nindā ||

37.3

हमहि देखि मृग-निकर पराहीं । मृगीं कहहिँ तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥
तुम्ह आनन्द करहु मृग-जाये । कञ्चन मृग खोजन ये आये ॥

hamahi dekhi mṛga-nikara parāhīṃ | mṛgīṃ kahahim̐ tumha kaham̐ bhaya nāhīṃ ||
tumha ānanda karahu mṛga-jāye | kañcana mṛga khojana ye āye ||

37.4

सङ्ग लाइ करिनीं कर लेहीं । मानहुँ मोहि सिखावन देहीं ॥
सास्त्र सुचिन्तित पुनि पुनि देखिय । भूप सुसेबित बस नहिँ लेखिअ ॥

saṅga lāi karinīṃ kara lehīṃ | mānahum̐ mohi sikhāvana dehīṃ ||
sāstra sucintita puni puni dekhiya | bhūpa susebita basa nahim̐ lekhia ||

37.5

राखिअ नारि जदपि उर माहीँ । जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥
देखहु तात बसन्त सुहावा । प्रिया-हीन मोहि भय उपजावा ॥

rākhia nāri jadapi ura māhīm̐ | jubatī sāstra nṛpati basa nāhīṃ ||
dekhahu tāta basanta suhāvā | priyā-hīna mohi bhaya upajāvā ||

दो॰ 37 (क)दोहा

बिरह-बिकल बल-हीन माहि, जानेसि निपट अकेल ।
सहित बिपिन मधुकर खग, मदन कीन्हि बगमेल ॥

biraha-bikala bala-hīna māhi, jānesi nipaṭa akela |
sahita bipina madhukara khaga, madana kīnhi bagamela ||

दो॰ 37 (ख)दोहा

देखि गयउ भ्राता सहित, तासु दूत सुनि बात ।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब, कटक हटकि मनजात ॥

dekhi gayau bhrātā sahita, tāsu dūta suni bāta |
ḍerā kīnheu manahum̐ taba, kaṭaka haṭaki manajāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0