चले राम त्यागा बन सोऊ । अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा । कहत कथा अनेक संबादा ॥
cale rāma tyāgā bana soū | atulita bala nara kehari doū ||
birahī iva prabhu karata biṣādā | kahata kathā aneka saṃbādā ||
7 श्लोक · 37 में से 46
राम उस वन को भी छोड़कर चले। प्रभु विरही की भाँति विषाद करते और अनेक बातें कहते हैं: लक्ष्मण, वन की शोभा देखो, इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध न होगा? सब पक्षी और मृग अपनी संगिनी के साथ हैं, मानो मेरी निन्दा करते हैं। हमें देखकर मृग भागते हैं और मृगियाँ कहती हैं: तुम्हें डर नहीं, ये सोने का मृग खोजने आए हैं। भली-भाँति चिन्तन किया हुआ शास्त्र भी बार-बार देखना चाहिए, भली-भाँति सेवित राजा को भी वश में न समझे, और स्त्री को हृदय में रखकर भी वश में न माने; पाठ के अनुसार युवती, शास्त्र और राजा किसी के वश नहीं होते। भाई, देखो वसन्त कितना सुहावना है; प्रिया के बिना यह मुझे भय देता है।
चले राम त्यागा बन सोऊ । अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा । कहत कथा अनेक संबादा ॥
cale rāma tyāgā bana soū | atulita bala nara kehari doū ||
birahī iva prabhu karata biṣādā | kahata kathā aneka saṃbādā ||
लछिमन देखु विपिन कै सोभा । देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥
नारि सहित सब खग-मृग-बृन्दा । मानहुँ मोरि करत हहिँ निन्दा ॥
lachimana dekhu vipina kai sobhā | dekhata kehi kara mana nahiṃ chobhā ||
nāri sahita saba khaga-mṛga-bṛndā | mānahum̐ mori karata hahim̐ nindā ||
हमहि देखि मृग-निकर पराहीं । मृगीं कहहिँ तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥
तुम्ह आनन्द करहु मृग-जाये । कञ्चन मृग खोजन ये आये ॥
hamahi dekhi mṛga-nikara parāhīṃ | mṛgīṃ kahahim̐ tumha kaham̐ bhaya nāhīṃ ||
tumha ānanda karahu mṛga-jāye | kañcana mṛga khojana ye āye ||
सङ्ग लाइ करिनीं कर लेहीं । मानहुँ मोहि सिखावन देहीं ॥
सास्त्र सुचिन्तित पुनि पुनि देखिय । भूप सुसेबित बस नहिँ लेखिअ ॥
saṅga lāi karinīṃ kara lehīṃ | mānahum̐ mohi sikhāvana dehīṃ ||
sāstra sucintita puni puni dekhiya | bhūpa susebita basa nahim̐ lekhia ||
राखिअ नारि जदपि उर माहीँ । जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥
देखहु तात बसन्त सुहावा । प्रिया-हीन मोहि भय उपजावा ॥
rākhia nāri jadapi ura māhīm̐ | jubatī sāstra nṛpati basa nāhīṃ ||
dekhahu tāta basanta suhāvā | priyā-hīna mohi bhaya upajāvā ||
बिरह-बिकल बल-हीन माहि, जानेसि निपट अकेल ।
सहित बिपिन मधुकर खग, मदन कीन्हि बगमेल ॥
biraha-bikala bala-hīna māhi, jānesi nipaṭa akela |
sahita bipina madhukara khaga, madana kīnhi bagamela ||
देखि गयउ भ्राता सहित, तासु दूत सुनि बात ।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब, कटक हटकि मनजात ॥
dekhi gayau bhrātā sahita, tāsu dūta suni bāta |
ḍerā kīnheu manahum̐ taba, kaṭaka haṭaki manajāta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0