अरण्यकाण्ड

अध्याय 24: सीता अग्नि में, उनकी छाया कुटी में

5 श्लोक · 24 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

सीता अग्नि में, उनकी छाया कुटी में

श्रीराम कहते हैं: हे प्रिये, सुन्दर व्रत और सुशील स्वभाव वाली, सुनो; अब मैं कुछ मनोहर नर-लीला करूँगा। जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो। प्रभु के सब कह चुकते ही सीता उनके चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गईं, और वहाँ अपनी प्रतिच्छाया रख गईं। भगवान ने जो लीला रची, उसका यह मर्म लक्ष्मण ने भी नहीं जाना। उधर स्वार्थ में डूबा नीच दशमुख मारीच के पास पहुँचा और सिर नवाया। तुलसीदास कहते हैं कि नीच का झुकना अत्यन्त दुखदायी है, जैसे अंकुश, धनुष और साँप का झुकना। मारीच ने पूजा करके आदर से पूछा: तात, किस कारण अकेले आए हो, मन इतना व्याकुल क्यों है?

24.1

सुनहु प्रिया व्रत रुचिर सुसीला । मैं कछु करब ललित नर लीला ॥
तुम्ह पावक महँ करहु निवासा । जौँ लगि करउँ निसाचर नासा ॥

sunahu priyā vrata rucira susīlā | maiṃ kachu karaba lalita nara līlā ||
tumha pāvaka maham̐ karahu nivāsā | jaum̐ lagi karaum̐ nisācara nāsā ||

24.2

जबहिँ राम सब कहा बखानी । प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ॥
निज प्रतिबिम्ब राखि तहँ सीता । तैसइ सील रूप सुबिनीता ॥

jabahim̐ rāma saba kahā bakhānī | prabhu pada dhari hiyam̐ anala samānī ||
nija pratibimba rākhi taham̐ sītā | taisai sīla rūpa subinītā ||

24.3

लछिमनहूँ यह मरम न जाना । जो कछु चरित रचा भगवाना ॥
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा । नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥

lachimanahūm̐ yaha marama na jānā | jo kachu carita racā bhagavānā ||
dasamukha gayau jahām̐ mārīcā | nāi mātha svāratha rata nīcā ||

24.4

नवनि नीच के अति दुखदाई । जिमि अङ्कुस धनु उरग बिलाई ॥
भय-दायक खल के प्रिय बानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥

navani nīca ke ati dukhadāī | jimi aṅkusa dhanu uraga bilāī ||
bhaya-dāyaka khala ke priya bānī | jimi akāla ke kusuma bhavānī ||

दो॰ 24दोहा

करि पूजा मारीच तब, सादर पूछी बात ।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति, अकसर आयहु तात ॥

kari pūjā mārīca taba, sādara pūchī bāta |
kavana hetu mana byagra ati, akasara āyahu tāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0