अरण्यकाण्ड

अध्याय 21: शूर्पणखा रावण को सभा में धिक्कारती है

8 श्लोक · 21 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

शूर्पणखा रावण को सभा में धिक्कारती है

शत्रु पर विजय होते ही देवों, मनुष्यों और मुनियों का भय मिट गया। लक्ष्मण सीता को ले आए, और सीता के नेत्र प्रभु को निहारकर तृप्त न हुए। प्रभु पंचवटी में चरित करते रहे। खर-दूषन का विनाश देखकर शूर्पणखा रावण के पास गई और भारी क्रोध से बोली: तू दिन-रात पीता और सोता है, देश और कोश की सुध भूल गया, सिर पर शत्रु खड़ा है। फिर वह नीति कहती है: नीति बिना राज्य, धर्म बिना धन, विवेक बिना विद्या, कुमन्त्र से राजा, मान से ज्ञान शीघ्र नष्ट होते हैं। शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी छोटा न समझे। सभा में व्याकुल होकर गिरती हुई वह रोती है: दशकन्धर, तेरे जीते मेरी ऐसी दशा हो?

21.1

जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥
तब लछिमन सीतहि लेइ आये । प्रभु पद परत हरषि उर लाये ॥

jaba raghunātha samara ripu jīte | sura nara muni saba ke bhaya bīte ||
taba lachimana sītahi lei āye | prabhu pada parata haraṣi ura lāye ||

21.2

सीता चितव स्याम मृदु गाता । परम प्रेम लोचन न अघाता ॥
पंचबटी बसि श्रीरघुनायक । करत चरित सुर-मुनि सुखदायक ॥

sītā citava syāma mṛdu gātā | parama prema locana na aghātā ||
paṃcabaṭī basi śrīraghunāyaka | karata carita sura-muni sukhadāyaka ||

21.3

धुआँ देखि खरदूषन केरा । जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥
बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस के सुरति बिसारी ॥

dhuām̐ dekhi kharadūṣana kerā | jāi supanakhām̐ rāvana prerā ||
bolī bacana krodha kari bhārī | desa kosa ke surati bisārī ||

21.4

करसि पान सोवसि दिन राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥

karasi pāna sovasi dina rātī | sudhi nahiṃ tava sira para ārātī ||
rāja nīti binu dhana binu dharmā | harihi samarpe binu satakarmā ||

21.5

विद्या बिनु बिबेक उपजाये । स्त्रम-फल पढ़े किये अरु पायें ॥
सङ्ग तेँ जती कुमन्त्र ते राजा । मान तेँ ज्ञान पान तेँ लाजा ॥

vidyā binu bibeka upajāye | strama-phala par̤he kiye aru pāyeṃ ||
saṅga tem̐ jatī kumantra te rājā | māna tem̐ jñāna pāna tem̐ lājā ||

21.6

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥

prīti pranaya binu mada te gunī | nāsahiṃ begi nīti asa sunī ||

21.सो॰ 21 (क)सोरठा

रिपु रुज पावक पाप, प्रभु अहि गनिय न छोट करि ।
अस कहि बिबिध बिलाप, करि लागी रोदन करन ॥

ripu ruja pāvaka pāpa, prabhu ahi ganiya na choṭa kari |
asa kahi bibidha bilāpa, kari lāgī rodana karana ||

दो॰ 21 (ख)दोहा

सभा माँझ परि व्याकुल, बहु प्रकार कह रोइ ।
तोहि जियत दसकन्धर, मोरि कि असि गति होइ ॥

sabhā mām̐jha pari vyākula, bahu prakāra kaha roi |
tohi jiyata dasakandhara, mori ki asi gati hoi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0