जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥
तब लछिमन सीतहि लेइ आये । प्रभु पद परत हरषि उर लाये ॥
jaba raghunātha samara ripu jīte | sura nara muni saba ke bhaya bīte ||
taba lachimana sītahi lei āye | prabhu pada parata haraṣi ura lāye ||
8 श्लोक · 21 में से 46
शत्रु पर विजय होते ही देवों, मनुष्यों और मुनियों का भय मिट गया। लक्ष्मण सीता को ले आए, और सीता के नेत्र प्रभु को निहारकर तृप्त न हुए। प्रभु पंचवटी में चरित करते रहे। खर-दूषन का विनाश देखकर शूर्पणखा रावण के पास गई और भारी क्रोध से बोली: तू दिन-रात पीता और सोता है, देश और कोश की सुध भूल गया, सिर पर शत्रु खड़ा है। फिर वह नीति कहती है: नीति बिना राज्य, धर्म बिना धन, विवेक बिना विद्या, कुमन्त्र से राजा, मान से ज्ञान शीघ्र नष्ट होते हैं। शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी छोटा न समझे। सभा में व्याकुल होकर गिरती हुई वह रोती है: दशकन्धर, तेरे जीते मेरी ऐसी दशा हो?
जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥
तब लछिमन सीतहि लेइ आये । प्रभु पद परत हरषि उर लाये ॥
jaba raghunātha samara ripu jīte | sura nara muni saba ke bhaya bīte ||
taba lachimana sītahi lei āye | prabhu pada parata haraṣi ura lāye ||
सीता चितव स्याम मृदु गाता । परम प्रेम लोचन न अघाता ॥
पंचबटी बसि श्रीरघुनायक । करत चरित सुर-मुनि सुखदायक ॥
sītā citava syāma mṛdu gātā | parama prema locana na aghātā ||
paṃcabaṭī basi śrīraghunāyaka | karata carita sura-muni sukhadāyaka ||
धुआँ देखि खरदूषन केरा । जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥
बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस के सुरति बिसारी ॥
dhuām̐ dekhi kharadūṣana kerā | jāi supanakhām̐ rāvana prerā ||
bolī bacana krodha kari bhārī | desa kosa ke surati bisārī ||
करसि पान सोवसि दिन राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥
karasi pāna sovasi dina rātī | sudhi nahiṃ tava sira para ārātī ||
rāja nīti binu dhana binu dharmā | harihi samarpe binu satakarmā ||
विद्या बिनु बिबेक उपजाये । स्त्रम-फल पढ़े किये अरु पायें ॥
सङ्ग तेँ जती कुमन्त्र ते राजा । मान तेँ ज्ञान पान तेँ लाजा ॥
vidyā binu bibeka upajāye | strama-phala par̤he kiye aru pāyeṃ ||
saṅga tem̐ jatī kumantra te rājā | māna tem̐ jñāna pāna tem̐ lājā ||
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥
prīti pranaya binu mada te gunī | nāsahiṃ begi nīti asa sunī ||
रिपु रुज पावक पाप, प्रभु अहि गनिय न छोट करि ।
अस कहि बिबिध बिलाप, करि लागी रोदन करन ॥
ripu ruja pāvaka pāpa, prabhu ahi ganiya na choṭa kari |
asa kahi bibidha bilāpa, kari lāgī rodana karana ||
सभा माँझ परि व्याकुल, बहु प्रकार कह रोइ ।
तोहि जियत दसकन्धर, मोरि कि असि गति होइ ॥
sabhā mām̐jha pari vyākula, bahu prakāra kaha roi |
tohi jiyata dasakandhara, mori ki asi gati hoi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0