अरण्यकाण्ड

अध्याय 20: एक धनुर्धर के आगे चौदह हजार ढेर

10 श्लोक · 20 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

एक धनुर्धर के आगे चौदह हजार ढेर

राम के बाण फुफकारते सर्पों-से चले। राक्षस योद्धा मुड़कर भागने लगे, पर खर, दूषन और त्रिशिरा तीनों भाइयों ने कहा कि जो भागेगा उसे हम स्वयं मारेंगे, तब वे मरने का निश्चय कर लौटे। प्रभु के नाराचों से छाती, सिर, भुजाएँ और पैर कटकर पहाड़ों-से गिरने लगे। सौ टुकड़े होकर भी योद्धा माया से उठ खड़े होते। गीध आँतें लेकर ऐसे उड़ते जैसे बालक पतंग उड़ा रहे हों। खर, दूषन और त्रिशिरा ने लौटकर अनगिनत शस्त्र चलाए; प्रभु ने पल में सबको काटकर हर नायक की छाती में दस-दस बाण मारे। एक अवधपति के सामने चौदह हजार देखकर देवता डरे, तब मायापति ने ऐसा कौतुक किया कि राक्षस एक-दूसरे में राम देखकर आपस में लड़ मरे। 'राम राम' कहते देह छोड़कर उन्होंने निर्वाण पाया; देवताओं ने फूल बरसाए।

20.छं॰ 1छन्द

तब चले जान बबान कराल । फुङ्करत जनु बहु ब्याल ।
कोपेउ समर श्रीराम । चले बिसिख निसित निकाम ॥
अवलोकि खर तर तीर । मुरि चले निसिचर बीर ।
भये क्रुद्ध तीनिउँ भाइ । जो भागि रन ते जाइ ॥

taba cale jāna babāna karāla | phuṅkarata janu bahu byāla |
kopeu samara śrīrāma | cale bisikha nisita nikāma ||
avaloki khara tara tīra | muri cale nisicara bīra |
bhaye kruddha tīnium̐ bhāi | jo bhāgi rana te jāi ||

20.छं॰ 2छन्द

तेहि बधब हम निज पानि । फिरे मरन मन महुँ ठानि ।
आयुध अनेक प्रकार । सनमुख ते करहिं प्रहार ॥
रिपु परम कोपे जानि । प्रभु धनुष सर सन्धानि ।
छाँड़े बिपुल नाराच । लगे कटन बिकट पिसाच ॥

tehi badhaba hama nija pāni | phire marana mana mahum̐ ṭhāni |
āyudha aneka prakāra | sanamukha te karahiṃ prahāra ||
ripu parama kope jāni | prabhu dhanuṣa sara sandhāni |
chām̐r̤e bipula nārāca | lage kaṭana bikaṭa pisāca ||

20.छं॰ 3छन्द

उर सीस भुज कर चरन । जहँ तहँ लगे महि परन ।
चिक्करत लागत बान । धर परत कुधर समान ॥
भट कटत तन सत-खंड । पुनि उठत करि पाखंड ।
नभ उड़त बहु भुज मुंड । बिनु मौलि धावत रुंड ॥

ura sīsa bhuja kara carana | jaham̐ taham̐ lage mahi parana |
cikkarata lāgata bāna | dhara parata kudhara samāna ||
bhaṭa kaṭata tana sata-khaṃḍa | puni uṭhata kari pākhaṃḍa |
nabha ur̤ata bahu bhuja muṃḍa | binu mauli dhāvata ruṃḍa ||

20.छं॰ 4छन्द

खग कङ्क काक सृगाल । कटकटहिँ कठिन कराल ।
कटकटहिँ जम्बुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर सञ्चहीँ ॥
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नञ्चहीँ ।
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिँ, भटन्ह के उर भुज सिरा ॥

khaga kaṅka kāka sṛgāla | kaṭakaṭahim̐ kaṭhina karāla |
kaṭakaṭahim̐ jambuka bhūta preta pisāca kharpara sañcahīm̐ ||
betāla bīra kapāla tāla bajāi jogini nañcahīm̐ |
raghubīra bāna pracaṃḍa khaṃḍahim̐, bhaṭanha ke ura bhuja sirā ||

20.छं॰ 5छन्द

जहँ तहँ परहिँ उठि लरहिँ धरु धरु-धरु करहिँ भयकर गिरा ।
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं ॥
संग्राम-पुर-बासी मनहुँ बहु, बाल गुड़ी उड़ावहीँ ।
मारे पछारे उर बिदारे, बिपुल भट कहँरत परे ॥

jaham̐ taham̐ parahim̐ uṭhi larahim̐ dharu dharu-dharu karahim̐ bhayakara girā |
aṃtāvarīṃ gahi ur̤ata gīdha pisāca kara gahi dhāvahīṃ ||
saṃgrāma-pura-bāsī manahum̐ bahu, bāla gur̤ī ur̤āvahīm̐ |
māre pachāre ura bidāre, bipula bhaṭa kaham̐rata pare ||

20.छं॰ 6छन्द

अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे ।
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीँ ॥
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीँ ।
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका ॥

avaloki nija dala bikala bhaṭa tisirādi khara dūṣana phire |
sara sakti tomara parasu sūla kṛpāna ekahi bārahīm̐ ||
kari kopa śrīraghubīra para aganita nisācara ḍārahīm̐ |
prabhu nimiṣa mahum̐ ripu sara nivāri pacāri ḍāre sāyakā ||

20.छं॰ 7छन्द

दस दस बिसिख उर माँझ मारे सकल निसिचर-नायका ।
महि परत उठि भट भिरत मरत न, करत माया अति घनी ॥
सुर डरत चौदह सहस प्रेत विलोकि एक अवध-धनी ।
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ, अति कौतुक कर्यो ॥

dasa dasa bisikha ura mām̐jha māre sakala nisicara-nāyakā |
mahi parata uṭhi bhaṭa bhirata marata na, karata māyā ati ghanī ||
sura ḍarata caudaha sahasa preta viloki eka avadha-dhanī |
sura muni sabhaya prabhu dekhi māyānātha, ati kautuka karyo ||

20.छं॰ 8छन्द

देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु-दल लरि मर्यो ।

dekhahiṃ parasapara rāma kari saṃgrāma ripu-dala lari maryo |

दो॰ 20 (क)दोहा

राम राम कहि तनु तजहिँ, पावहिँ पद निर्बान ।
करि उपाय रिपु मारे, छन महुँ कृपानिधान ॥

rāma rāma kahi tanu tajahim̐, pāvahim̐ pada nirbāna |
kari upāya ripu māre, chana mahum̐ kṛpānidhāna ||

दो॰ 20 (ख)दोहा

हरषित बरषहिँ सुमन सुर, बाजहिँ गगन निसान ।
अस्तुति करि करि सब चले, सोभित विविध बिमान ॥

haraṣita baraṣahim̐ sumana sura, bājahim̐ gagana nisāna |
astuti kari kari saba cale, sobhita vividha bimāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0