इस अध्याय में क्या होता है शूर्पणखा का पंचवटी आना कुछ दिन ज्ञान और नीति की चर्चा में बीतते हैं। तब रावण की बहन शूर्पणखा पंचवटी आती है और दोनों कुमारों को देखकर विकल हो जाती है। सुन्दर रूप धरकर वह मुस्कराती हुई राम से कहती है: तुम-सा पुरुष नहीं, मुझ-सी स्त्री नहीं, इसीलिए अब तक कुमारी हूँ। सीता की ओर देखकर प्रभु कहते हैं कि मेरा छोटा भाई कुमार है। लक्ष्मण उसे शत्रु की बहन जानकर कहते हैं कि मैं तो दास हूँ। वह बार-बार इधर-उधर जाती है, तब लक्ष्मण कहते हैं कि तुमसे वही ब्याह करेगा जो लाज छोड़ दे। खिसियाकर वह भयंकर रूप प्रकट करती है। सीता को डरी देख राम संकेत करते हैं और लक्ष्मण फुर्ती से उसके नाक-कान काट देते हैं, मानो उसके हाथ रावण को चुनौती भेजी हो।
17.1 भगति-जोग सुनि अति सुख पावा । लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥ एहि बिधि गये कछुक दिन बीती । कहत बिराग ज्ञान गुन नीती ॥
bhagati-joga suni ati sukha pāvā | lachimana prabhu carananhi siru nāvā || ehi bidhi gaye kachuka dina bītī | kahata birāga jñāna guna nītī ||
17.2 सूपनखा रावन के बहिनी । दुष्ट हृदय दारुन जसि अहिनी ॥ पंचवटी सो गइ एक बारा । देखि बिकल भइ जुगल कुमारा ॥
sūpanakhā rāvana ke bahinī | duṣṭa hṛdaya dāruna jasi ahinī || paṃcavaṭī so gai eka bārā | dekhi bikala bhai jugala kumārā ||
17.3 भ्राता पिता पुत्र उरगारी । पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥ होइ बिकल सक मनहिं न रोकी । जिमि रवि-मनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥
bhrātā pitā putra uragārī | puruṣa manohara nirakhata nārī || hoi bikala saka manahiṃ na rokī | jimi ravi-mani drava rabihi bilokī ||
17.4 रुचिर रूप धरि प्रभु पहिँ जाई । बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी । यह संजोग विधि रचा बिचारी ॥
rucira rūpa dhari prabhu pahim̐ jāī | bolī bacana bahuta musukāī || tumha sama puruṣa na mo sama nārī | yaha saṃjoga vidhi racā bicārī ||
17.5 मम अनुरूप पुरुष जग माहीँ । देखेउँ खोजि लोक तिहुँ नाहीँ ॥ ता तेँ अब लगि रहिउँ कुमारी । मन माना कछु तुम्हहिँ निहारी ॥
mama anurūpa puruṣa jaga māhīm̐ | dekheum̐ khoji loka tihum̐ nāhīm̐ || tā tem̐ aba lagi rahium̐ kumārī | mana mānā kachu tumhahim̐ nihārī ||
17.6 सीतहि चितइ कही प्रभु बाता । अहइ कुमार मोर लघु भ्राता ॥ गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी । प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी ॥
sītahi citai kahī prabhu bātā | ahai kumāra mora laghu bhrātā || gai lachimana ripu bhaginī jānī | prabhu biloki bole mṛdu bānī ||
17.7 सुन्दरि सुनु मैं उन्ह कर दासा । पराधीन नहिँ तोर सुपासा ॥ प्रभु समरथ कोसलपुर राजा । जो कछु करहिँ उनहि सब छाजा ॥
sundari sunu maiṃ unha kara dāsā | parādhīna nahim̐ tora supāsā || prabhu samaratha kosalapura rājā | jo kachu karahim̐ unahi saba chājā ||
17.8 सेवक सुख चह मान भिखारी । व्यसनी धन सुभ-गति बिभिचारी ॥ लोभी जस चह चार गुमानी । नभ दुहि दूध चहत ये प्रानी ॥
sevaka sukha caha māna bhikhārī | vyasanī dhana subha-gati bibhicārī || lobhī jasa caha cāra gumānī | nabha duhi dūdha cahata ye prānī ||
17.9 पुनि फिरि राम निकट सो आई । प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई । जो तृन तोरि लाज परिहरई ॥
puni phiri rāma nikaṭa so āī | prabhu lachimana pahiṃ bahuri paṭhāī || lachimana kahā tohi so baraī | jo tṛna tori lāja pariharaī ||
17.10 तब खिसिआनि राम पहिँ गई । रूप भयङ्कर प्रगटत भई ॥ सीतहि सभय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥
taba khisiāni rāma pahim̐ gaī | rūpa bhayaṅkara pragaṭata bhaī || sītahi sabhaya dekhi raghurāī | kahā anuja sana sayana bujhāī ||
दो॰ 17 दोहा लछिमन अति लाघवँ सो, नाक कान बिनु कीन्हि । ता के कर रावन कहँ, मनहुँ चुनौती दीन्हि ॥
lachimana ati lāghavam̐ so, nāka kāna binu kīnhi | tā ke kara rāvana kaham̐, manahum̐ cunautī dīnhi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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