इस अध्याय में क्या होता है खर-दूषन की सेना राम पर चढ़ आई नाक-कान कटने से शूर्पणखा ऐसी विकराल हुई मानो पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो। वह विलाप करती खर-दूषन के पास गई: धिक्कार है तुम्हारे पौरुष को, भाइयो। सब सुनकर उन्होंने सेना सजाई, और राक्षसों के झुण्ड पंखवाले काजल के पहाड़ों-से दौड़े नाक-कान-हीन शूर्पणखा को आगे करके। अनगिनत अपशकुन हुए, पर मृत्यु के वश वे कुछ नहीं गिनते। राम ने लक्ष्मण से कहा: जानकी को लेकर पर्वत की गुफा में जाओ और सावधान रहो। फिर मुस्कराकर कठोर धनुष चढ़ाया और जटा बाँधी। वे शत्रु को ऐसे देखते हैं जैसे सिंह हाथियों के झुण्ड को, और योद्धा उन्हें बाल-सूर्य को घेरते दैत्यों-से घेर लेते हैं।
18.1 नाक कान बिनु भइ बिकरारा । जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा ॥ खर दूषन पहिँ गइ बिलपाता । धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥
nāka kāna binu bhai bikarārā | janu strava saila gairu kai dhārā || khara dūṣana pahim̐ gai bilapātā | dhiga dhiga tava pauruṣa bala bhrātā ||
18.2 तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई । जातुधान सुनि सेन बनाई ॥ धाये निसिचर-निकर बरूथा । जनु सपच्छ कज्जल-गिरि जूथा ॥
tehi pūchā saba kahesi bujhāī | jātudhāna suni sena banāī || dhāye nisicara-nikara barūthā | janu sapaccha kajjala-giri jūthā ||
18.3 नाना बाहन नानाकारा । नानायुध-धर घोर अपारा ॥ सूपनखा आगें करि लीनी । असुभ-रूप श्रुति नासा हीनी ॥
nānā bāhana nānākārā | nānāyudha-dhara ghora apārā || sūpanakhā āgeṃ kari līnī | asubha-rūpa śruti nāsā hīnī ||
18.4 असगुन अमित होहिँ भयकारी । गनहिँ न मृत्यु बिबस सब झारी ॥ गर्जहि तर्जहिँ गगन उड़ाहीं । देखि बिकट पर अति हरषाहीं ॥
asaguna amita hohim̐ bhayakārī | ganahim̐ na mṛtyu bibasa saba jhārī || garjahi tarjahim̐ gagana ur̤āhīṃ | dekhi bikaṭa para ati haraṣāhīṃ ||
18.5 कोउ कह जियत धरहु दोउ भाई । धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई ॥ धूरि पूरि लम-मंडल रहा । राम बोलाइ अनुज सन कहा ॥
kou kaha jiyata dharahu dou bhāī | dhari mārahu tiya lehu char̤āī || dhūri pūri lama-maṃḍala rahā | rāma bolāi anuja sana kahā ||
18.6 लेइ जानकिहि जाहु गिरि-कन्दर । आवा निसिचर कटक भयङ्कर ॥ रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी । चले सहित श्री सर धनु पानी ॥
lei jānakihi jāhu giri-kandara | āvā nisicara kaṭaka bhayaṅkara || rahehu sajaga suni prabhu kai bānī | cale sahita śrī sara dhanu pānī ||
18.7 देखि राम रिपु-दल चढ़ि आवा । बिहँसि कठिन कोदंड चढ़ावा ॥
dekhi rāma ripu-dala car̤hi āvā | biham̐si kaṭhina kodaṃḍa car̤hāvā ||
18.छं॰ 1 छन्द कोदंड कठिन चढाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों । मरकत सैल पर लरत दामिनि कोटि सोँ जुग भुजग ज्योँ ॥ कटि कसि निषङ्ग बिसाल भुज गहि, चाप बिसिख सुधारि कै । चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज-घटा निहारि कै ॥
kodaṃḍa kaṭhina caḍhāi sira jaṭa jūṭa bām̐dhata soha kyoṃ | marakata saila para larata dāmini koṭi som̐ juga bhujaga jyom̐ || kaṭi kasi niṣaṅga bisāla bhuja gahi, cāpa bisikha sudhāri kai | citavata manahum̐ mṛgarāja prabhu gajarāja-ghaṭā nihāri kai ||
18.सो॰ 18 सोरठा आइ गये बगमेल, धरहु धरहु धावत सुभट । जथा बिलोकि अकेल, बाल रबिहि घेरत दनुज ॥
āi gaye bagamela, dharahu dharahu dhāvata subhaṭa | jathā biloki akela, bāla rabihi gherata danuja ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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