शान्ति पर्व

अध्याय 326: आसुरि का कपिल से व्यक्त और अव्यक्त पर प्रश्न

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि षङ्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥

6 श्लोक · 326 में से 372

इस अध्याय में क्या होता है

आसुरि का कपिल से व्यक्त और अव्यक्त पर प्रश्न

छह श्लोकों का छोटा अध्याय, कुछ भाग गद्य में। युधिष्ठिर भीष्म से अव्यक्त और व्यक्त तत्त्वों का निश्चय और अजन्मा भगवान की कृति पूछते हैं। भीष्म उत्तर में गुरु कपिल और शिष्य आसुरि का संवाद आरम्भ करते हैं। आसुरि अपने प्रश्नों की लम्बी सूची रखते हैं। व्यक्त क्या है, अव्यक्त क्या है और दोनों के बीच क्या है? तत्त्वों में आदि कौन सा है और मध्य कौन सा? अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत क्या हैं? सर्ग कितने हैं और उनका लय कैसे होता है? ज्ञाता कौन है? बुद्ध क्या है, अबुद्ध क्या और बुध्यमान क्या? वे एकत्व, नानात्व, विद्या और अविद्या के विषय में भी पूछते हैं। उत्तर आगे के अध्यायों में हैं।

* युधिष्ठिर उवाच

326.1

अव्यक्तव्यक्ततत्वानां निश्चयं भरतर्षभ ।
वक्तुमर्हसि कौरव्य देवस्याजस्य या कृतिः

avyaktavyaktatatvānāṃ niścayaṃ bharatarṣabha |
vaktumarhasi kauravya devasyājasya yā kṛtiḥ

भीष्म उवाच

326.2

अत्राप्युदाहरन्तीमं संवादं गुरुशिष्ययोः ।
कपिलस्यासुरेश्चैव सर्वदुःखविमोक्षणम्

atrāpyudāharantīmaṃ saṃvādaṃ guruśiṣyayoḥ |
kapilasyāsureścaiva sarvaduḥkhavimokṣaṇam

असुरिरुवाच

326.3

अव्यक्तव्यक्ततत्वानां निश्चयं बुद्धिनिश्चयम् ।
भगवन्नमितप्रज्ञ वक्तुमर्हसि मेऽर्थितः

avyaktavyaktatatvānāṃ niścayaṃ buddhiniścayam |
bhagavannamitaprajña vaktumarhasi me'rthitaḥ

326.4

किं व्यक्तं किमव्यक्तं किं व्यक्ता
व्यक्तं किमिति तत्वानि ।
किमाद्यं मध्यमं च तत्वानां
किमध्यात्माधिभूतदैवतं च

kiṃ vyaktaṃ kimavyaktaṃ kiṃ vyaktā
vyaktaṃ kimiti tatvāni |
kimādyaṃ madhyamaṃ ca tatvānāṃ
kimadhyātmādhibhūtadaivataṃ ca

326.5

किंनु सर्गाप्ययं कति सर्गाः किं भूतं
किं भविष्यं किं भव्यं च किं ज्ञानम् ।
को ज्ञाता किं बुद्धं किमप्रबुद्धं
किं बुध्यमानं कति पर्वाणि

kiṃnu sargāpyayaṃ kati sargāḥ kiṃ bhūtaṃ
kiṃ bhaviṣyaṃ kiṃ bhavyaṃ ca kiṃ jñānam |
ko jñātā kiṃ buddhaṃ kimaprabuddhaṃ
kiṃ budhyamānaṃ kati parvāṇi

326.6

कति स्रोतांसि कति कर्मयोनयः
किमेकत्वं नानात्वम् ।
किं सहवासं निवासं
किं विद्याविद्यमिति

kati srotāṃsi kati karmayonayaḥ
kimekatvaṃ nānātvam |
kiṃ sahavāsaṃ nivāsaṃ
kiṃ vidyāvidyamiti

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