वन पर्व

अध्याय 199: सेदुक का ब्राह्मण को वृषदर्भ के पास भेजना

11 श्लोक · 199 में से 315

इस अध्याय में क्या होता है

सेदुक का ब्राह्मण को वृषदर्भ के पास भेजना

मार्कण्डेय वृषदर्भ और सेदुक नामक दो राजाओं की कथा कहते हैं। सेदुक जानते थे कि वृषदर्भ ने बचपन से एक गुप्त व्रत ले रखा है कि ब्राह्मण को सोने चाँदी के सिवा कुछ नहीं देंगे। एक वेदज्ञ ब्राह्मण ने सेदुक को आशीर्वाद देकर गुरुदक्षिणा हेतु सहस्र घोड़े माँगे। सेदुक ने कहा कि मैं नहीं दे सकता, पर तुम वृषदर्भ के पास जाओ, वे अवश्य देंगे। ब्राह्मण ने वृषदर्भ से सहस्र घोड़े माँगे, तो राजा ने उसे कोड़े से मारा। ब्राह्मण ने पूछा कि निरपराध को क्यों मारते हो। जब वह शाप देने लगा, तो राजा ने पूछा कि जो न दे उसे शाप देना क्या ब्राह्मण का धर्म है। हमारे पाठ में अध्याय यहीं अचानक समाप्त हो जाता है।

वैशम्पायन उवाच

199.1

भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः

bhūya eva mahābhāgyaṃ kathyatāmityabravīt pāṇḍavaḥ

199.2

अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ

athācaṣṭa mārkaṇḍeyo mahārāja vṛṣadarbhasedukanāmānau rājānau nītimārgaratāvastropāstrakṛtinau

199.3

सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजा- नात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य

seduko vṛṣadarbhasya bālasyaiva upāṃśuvratamabhyajā- nāt kupyamadeyaṃ brāhmaṇasya

199.4

अथ तं सेदुकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान्

atha taṃ sedukaṃ brāhmaṇaḥ kaścid vedādhyayanasampanna āśiṣaṃ dattvā gurvarthī bhikṣitavān

199.5

अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत्

aśvasahasraṃ me bhavān dadātviti taṃ seduko brāhmaṇamabravīt

199.6

नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति

nāsti sambhavo gurvarthaṃ dātumiti

199.7

स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् । राजा परमधर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व ।
स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति

sa tvaṃ gaccha vṛṣadarbhasakāśam | rājā paramadharmajño brāhmaṇa taṃ bhikṣasva |
sa te dāsyati tasyaitadupāṃśuvratamiti

199.8

अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् ।
स राजा तं कशेनाताडयत्

atha brāhmaṇo vṛṣadarbhasakāśaṃ gatvā aśvasahasramayācat |
sa rājā taṃ kaśenātāḍayat

199.9

तं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । किं हिंस्यनागसं मामिति

taṃ brāhmaṇo'bravīt | kiṃ hiṃsyanāgasaṃ māmiti

199.10

एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह । विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत्

evamuktvā taṃ śapantaṃ rājā''ha | vipra kiṃ yo na dadāti tubhyamutāhosvid brāhmaṇyametat

199.11

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सेदुकवृषदर्भचरिते षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः

iti śrīmahābhārate vanaparvaṇi mārkaṇḍeyasamāsyāparvaṇi sedukavṛṣadarbhacarite ṣaṇṇavatyadhikaśatatamo'dhyāyaḥ

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