आदि पर्व

अध्याय 10: डुण्डुभ की रुरु से विनती

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि दशमोऽध्यायः ॥

8 श्लोक · 10 में से 261

इस अध्याय में क्या होता है

डुण्डुभ की रुरु से विनती

रुरु डुण्डुभ को अपना कारण बताते हैं। उनकी प्राणों जैसी प्रिय पत्नी को साँप ने डसा था, और उन्होंने प्रण किया है कि जो भी साँप दिखेगा उसे मारेंगे, इसलिए यह भी मरेगा। डुण्डुभ कहता है कि मनुष्यों को डसने वाले साँप दूसरे हैं। डुण्डुभ केवल नाम से सर्प हैं; उनके अनर्थ, उनके धर्म, उनके दुःख और सुख डसने वाले साँपों से अलग हैं, इसलिए धर्म जानने वाले रुरु उन्हें न मारें। यह सुनकर रुरु रुक जाते हैं, शान्त होते हैं और डरे हुए जीव से कोमल स्वर में पूछते हैं कि वह वास्तव में कौन है। डुण्डुभ बताता है कि वह पहले सहस्रपात् नाम का ऋषि था और एक ब्राह्मण के शाप से सर्प बना। रुरु पूछते हैं कि उस ब्राह्मण ने क्रोध में उसे शाप क्यों दिया।

रुरुरुवाच

10.1

मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद्भुजगेन ह ।
तत्र मे समयो घोर आत्मनोरग वै कृतः

mama prāṇasamā bhāryā daṣṭāsīdbhujagena ha |
tatra me samayo ghora ātmanoraga vai kṛtaḥ

10.2

भुजंगं वै सदा हन्यां यं यं पश्येयमित्युत ।
ततोऽहं त्वां जिघांसामि जीवितेनाद्य मोक्ष्यसे

bhujaṃgaṃ vai sadā hanyāṃ yaṃ yaṃ paśyeyamityuta |
tato'haṃ tvāṃ jighāṃsāmi jīvitenādya mokṣyase

डुण्डुभ उवाच

10.3

अन्ये ते भुजगा ब्रह्मन्ये दश्तीह मानवान् ।
डुण्डुभानहिगन्धेन न त्वं हिंसितुमर्हसि

anye te bhujagā brahmanye daśtīha mānavān |
ḍuṇḍubhānahigandhena na tvaṃ hiṃsitumarhasi

10.4

एकानर्थान्पृथग्धर्मानेकदुःखान्पृथक्सुखान् ।
डुण्डुभान्धर्मविद्भूत्वा न त्वं हिंसितुमर्हसि

ekānarthānpṛthagdharmānekaduḥkhānpṛthaksukhān |
ḍuṇḍubhāndharmavidbhūtvā na tvaṃ hiṃsitumarhasi

सौतिरुवाच

10.5

इति श्रुत्वा वचस्तस्य डुण्डुभस्य रुरुस्तदा ।
नावधीद्भयसंविग्नमृषिं मत्त्वाऽथ डुण्डुभम्

iti śrutvā vacastasya ḍuṇḍubhasya rurustadā |
nāvadhīdbhayasaṃvignamṛṣiṃ mattvā'tha ḍuṇḍubham

10.6

उवाच चैनं भगवान्रुरुः संशमयन्निव ।
केन त्वं भुजग ब्रूहि कोऽसीमां विक्रियां गतः

uvāca cainaṃ bhagavānruruḥ saṃśamayanniva |
kena tvaṃ bhujaga brūhi ko'sīmāṃ vikriyāṃ gataḥ

डुण्डुभ उवाच

10.7

अहं पुरा रुरो नाम्ना ऋषिरासं सहस्रपात् ।
सोऽहं शापेन विप्रस्य भुजगत्वमुपागतः

ahaṃ purā ruro nāmnā ṛṣirāsaṃ sahasrapāt |
so'haṃ śāpena viprasya bhujagatvamupāgataḥ

रुरुरुवाच

10.8

किमर्थं शप्तवान्कुद्धो द्विजस्त्वां भुजगोत्तम ।
कियन्तं चैव कालं ते वपुरेतद्भविष्यसि

kimarthaṃ śaptavānkuddho dvijastvāṃ bhujagottama |
kiyantaṃ caiva kālaṃ te vapuretadbhaviṣyasi

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)