उत्तर खण्ड — प्रेत काण्ड (धर्म काण्ड)

अध्याय 43: व्रतभंग और रोगी की शुद्धि

इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशे धर्मकाण्डे प्रेतकल्पे श्रीकृष्णगरुडसंवादे शुद्धिनिरूपणं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥

5 श्लोक · 43 में से 49

इस अध्याय में क्या होता है

व्रतभंग और रोगी की शुद्धि

यह श्रीविष्णु के निर्णयों का छोटा अध्याय है। जो जल, अग्नि या फन्दे से मृत्यु से लौट आए, अथवा जिन्होंने संन्यास या अनशन व्रत छोड़ दिया, वे दो चान्द्रायण प्रायश्चित्तों और एक गौ तथा एक वृषभ के दान से शुद्ध होते हैं। चार से बारह वर्ष के बालक का प्रायश्चित्त माता, पिता या कोई बन्धु करता है, और इससे छोटे बालक का कोई अपराध नहीं, न उसे राजदण्ड है न प्रायश्चित्त। अन्त में रोगग्रस्त स्त्री के रजोदर्शन का नियम है: चौथे दिन वह स्नान से शुद्ध होती है। यदि वह रोग के कारण स्नान न कर सके, तो कोई स्वस्थ व्यक्ति दस बार स्नान करे और हर स्नान के बाद उसे स्पर्श करे, इस प्रकार वह शुद्ध होती है।

श्रीविष्णुरुवाच

43.1

जलाग्निबन्धनभ्रष्टा प्रव्रज्यानाशकच्युताः ।
ऐन्दवाभ्यां विशुध्यन्ति दत्त्वा धेनुं तथा वृषम्

jalāgnibandhanabhraṣṭā pravrajyānāśakacyutāḥ |
aindavābhyāṃ viśudhyanti dattvā dhenuṃ tathā vṛṣam

43.2

ऊनद्वादशवर्षस्य चतुर्वर्षाधिकस्य च ।
प्रायश्चित्तं चरेन्माता पिता वान्योऽपि बान्धवः

ūnadvādaśavarṣasya caturvarṣādhikasya ca |
prāyaścittaṃ carenmātā pitā vānyo'pi bāndhavaḥ

43.3

अतो बालनरस्यापि नापराधो न पातकम् ।
राजदण्डो न तस्यास्ति प्रायश्चित्तं न विद्यते

ato bālanarasyāpi nāparādho na pātakam |
rājadaṇḍo na tasyāsti prāyaścittaṃ na vidyate

43.4

रक्तस्य दर्शने दष्टे आतुरा स्त्री भवेद्यदि ।
चतुर्थेऽह्नि पदादींश्च त्यक्त्वा स्नात्वा विशुध्यति

raktasya darśane daṣṭe āturā strī bhavedyadi |
caturthe'hni padādīṃśca tyaktvā snātvā viśudhyati

43.5

आतुरे स्नान उत्पन्ने दशकृत्वो ह्यनातुरः ।
स्नात्वास्नात्वास्पृशेदेनं ततः शुध्येत्स आतुरः

āture snāna utpanne daśakṛtvo hyanāturaḥ |
snātvāsnātvāspṛśedenaṃ tataḥ śudhyetsa āturaḥ

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